गूगल ने डूडल के जरिए मनाया ‘Father of the Deaf’ चार्ल्स मिशेल डी लेप का 306वां जन्मदिन

46
Charles-michele-de-lepees-306th-birthday

चार्ल्स मिशेल डी लेप के 306वें जन्‍मदिवस पर गूगल (Google) ने उनके सम्‍मान में डूडल बनाया है। चार्ल्‍स-मिशेल को ‘बधिरों का पिता’ कहा जाता है। 18वीं सदी के फ्रांसीसी समाजसेवक चार्ल्‍स-मिशेल ने एक ऐसा सिस्‍टम बनाया था जिससे बधिरों को साइन लैंग्‍वेज सिखाई जा सकी। कई साल बाद इशारों की इस भाषा को अमेरिका ने अपनाया, जिसके बाद यह पूरी दुनिया में फैल गई। उन्‍होंने ही 1769 में बधिरों के लिए पहले मुक्‍त विद्यालय की स्‍थापना की।

कौन थे चार्ल्‍स-मिशेल : 24 नवंबर 1712 को जन्में चार्ल्स मिशेल को बहरे लोगों का जनक कहा जाता है। मिशेल एक सुखी संपन्न परिवार से ताल्लुक रखते थे, लेकिन उन्होंने पढाई को छोड़कर कैथोलिक का रास्ता अपनाया। हालांकि वो यहां भी ज्यादा दिन नहीं टिक सके, क्योंकि उनका मन हमेशा से गरीबों की मदद के लिए आगे आना चाहता था। वो गरीबों की परेशानियों को कम करना चाहते थे। वो उनके पास जाते। उनसे उनकी तकलीफों के बारे में पूछते और फिर उसे कम करने के लिए कोशिशों में जुट जाते थे।

इसी दौरान उनकी मुलाकात दो बहनों से हुई जो सुन नहीं सकती थी। ये बहनें एक दूसरे से इशारों में बात कर रही थी। जब चार्ल्स ने उन्हें देखा तो उन्हें लगा कि बहरे लोगों को किसी की बात को समझने में बहुत मुश्किल होती है। फिर उनके दिमाग में आया कि क्यों न बहरे लोगों के लिए एक ऐसी भाषा बनाई जाए जो न केवल उन्हें दूसरों की बात को समझाने में मदद करें बल्कि उसे स्कूलों में भी पढ़ाया जा सके।

1760 में उन्होंने फ़्रांस की पहली ऐसी स्कूल खोली, जहां सुनने में असमर्थ लोगों को सांकेतिक भाषा या चिन्ह प्रणाली भाषा सिखाई जाती थी। इस भाषा के इस्तेमाल से ये लोग अपनी बातों को दूसरे तक पहुंचा सकते थे। चार्ल्स मिशेल डी लेप की बनाई चिन्ह भाषा को पहली फ़्रांस की चिन्ह भाषा कहा जाता है। इनके द्वारा बनाई गयी यह भाषा इतनी आसान थी कि कई दशकों के बाद इसे अमेरिका द्वारा अपनाया गया।

क्‍या बना है डूडल में

Google ने अपने डूडल में चार्ल्‍स मिशेल की भाषा में Google लिखा है। इसको प्रदर्शित करने के लिए छह लड़कियों का सहारा लिया गया है जो इशारों में Google कहती दिख रही हैं।

दुनिया भर के टीचर्स को सिखाया अपना तरीका

चार्ल्‍स मिशेल ने अपना ज्ञान खुद तक सीमित नहीं रखा। उन्‍होंने अपने तरीके और कक्षाएं पूरी दुनिया के लिए खोल दिए थे। उसी का परिणाम है कि आज तक उनके बनाए सिस्‍टम से बधिर बच्‍चे पढ़ते हैं। चार्ल्‍स ने कई देशों के शिक्षकों को अपने तरीके से ट्रेनिंग दी, जिन्‍होंने अपने-अपने देशों में इसका प्रसार किया।

चार्ल्‍स के स्‍कूल को मिली थी सरकारी मदद

चार्ल्‍स ने पुरखों से मिली जायदाद के जरिए 1760 में बधिरों के लिए स्‍कूल खोला। इसमें कोई भी पढ़ सकता था। चार्ल्‍स की कोशिशों को फ्रांसीसी अधिकारियों ने भी सराहा और जल्‍द ही उन्‍हें सरकारी मदद मिल गई। जल्‍द ही बधिर लोगों के अधिकारों को फ्रांस ने मान्‍यता भी दे दी।

चार्ल्‍स के तरीके का बाद में हुआ विरोध

चार्ल्‍स ने शिक्षा देने के लिए जो तरीका अपनाया, उसको बड़ी सफलता मिली। हालांकि उनके बाद आने वाले शिक्षाविदों ने चार्ल्‍स के तरीके पर यह कहकर सवाल खड़े किए कि उनके छात्र सिर्फ उनके इशारों की नकल कर रहे थे, कुछ समझ नहीं पा रहे थे।

चार्ल्‍स ने नहीं किया साइन लैंग्‍वेज का सृजन

चार्ल्‍स मिशेल को अक्‍सर साइन लैंग्‍वेज का जनक कहा जाता है, हालांकि यह सही नहीं है। असल में, चार्ल्‍स को बधिरों ने ही इशारों से बात करना सिखाया था। उन्‍होंने फ्रांसीसी इशारों को श्रेणीगत किया और रिकॉर्ड किया ताकि दूसरों को यह सिखाया जा सके। शिक्षा में चार्ल्‍स के श्रेणीबद्ध सिस्‍टम का खूब प्रयोग हुआ।

पेरिस में आज भी चलता है चार्ल्‍स का स्‍कूल

पेरिस में जो स्‍कूल चार्ल्‍स मिशेल ने स्‍थापित किया, वह अभी भी है। हालांकि अब वह चार्ल्‍स के इशारों की बजाय क्‍लास में फ्रेंच साइन लैग्‍वेज का इस्‍तेमाल करता है। पेरिस के सेंट-जेक्‍स इलाके में स्थित यह स्‍कूल, देश के चार राष्‍ट्रीय बधिर स्‍कूलों में से एक है।

चार्ल्‍स की वजह से अपना केस लड़ पाए बधिर

चार्ल्‍स मिशेल ने सुनने में अक्षम लोगों के लिए इशारों की एक भाषा तैयार की, इसे फ्रांस की साइन लैंग्‍वेज कहा जाता है। शुरु में चार्ल्‍स का लक्ष्‍य इसके जरिए धार्मिक शिक्षा देना था, मगर उनकी भाषा की बदौलत पहली बार बहरे लोग भी अदालत में अपना बचाव कर पाए। धीरे-धीरे यह भाषा पूरी दुनिया के काम आने लगी।

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here