वाणी पर संयम आवश्यक

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Abstinence

मनुष्य जीवन में मौन, मन की एक आदर्श व्यवस्था है। मौन का भाव है, मन का निस्पन्द होना। मन की चंचलता समाप्त होते ही मौन की दिव्य अनुभूति होने लगती है। मौन मन का एक दिव्य अलंकार है, जो इसके स्थिर हो जाने पर सहजता से प्राप्त किया जा सकता है। मौन से मानसिक ऊर्जा का क्षरण रोककर इसे मानसिक शक्तियों के विकास एवं वध्र्दन में नियोजित किया जाना सम्भव है। मौन मन को ऊध्र्वमुखी बनाता है तथा इसकी गति को दिशा विशेष में तीव्र कर देता है।

विवादों से मुक्ति:-  मौन रहना अनावश्यक विवादों के उधेड़बुन से मुक्ति पाना है। चुप रहने को यदि मौन की संज्ञा दी जाए, तो समझना चाहिए कि इसके मर्म एवं तथ्य से हम बहुत दूर हैं। सामान्य तौर पर मनुष्य बोलकर मानसिक ऊर्जा का जितना अपव्यय करता है, उससे कहीं अधिक विवशतावश चुप रहकर करता है। ऐसी अवस्था में विचारों की टेढ़ी लकीरें परस्पर टकराने लगती हैं और अपने को अभिव्यक्त करने के लिए मन का संधान करती हैं। चुप रहते हैं और मन की इस व्यथा को भी सेहत हैं। बोलना चाहते हैं और बोलते भी नहीं। इस कशमकश से तो भला है कि बोलकर अपने को हल्का कर लिया जाये। इसके अभाव में मानसिक शक्तियां कुंठित हो जाती हैं। उनमें गांठें पड़ जाती हैं और अन्ततः ये गांठें हमारे अचेतन मन को जख्मों से छलनी कर देती है। ऐसा मौन अत्यन्त कष्टकारी होती है।

अतिविवशता पर चुप रहना भी ठीक नहीं है, तो मन को उच्छृंखल-उन्मुक्त होने देना भी अच्छा नहीं है। जब भी मन सीमा पार करता है तो वाणी वाचाल हो जाती है, क्योंकि वाणी और मन का संबंध अग्नि और तपन के समान है। चंचल मन-वाणी के प्रवाह को नियंत्रित नहीं कर सकता है और अनियंत्रित वाणी के दुष्प्रभाव से भला कौन परिचित नहीं है। विष बुझा वाणी से तो आग्नेयास्त्र एवं परमाणु बम का घातक प्रभाव भी कम है। ऐसी वाणी दूसरों की भावनाओं को आहत करने के साथ ही स्वयं को भी क्षत-विक्षत करती है। द्वापर में महारानी द्रोपदी की कटुवाणी महाभारत के महासंग्राम की आधारशिला बनी। अशान्त, व्यग्र और पीड़ित मन की यह अवस्था होती है। रुग्ण मन मनुष्य को अनर्गल प्रलाप के ऐसे अन्धकूप में ढकेल देता है, जहां से निकलने का कोई भी मार्ग शेष नहीं रहता।

ज्यादा बोलना व्यक्तित्व पर ग्रहण लगने के समान है। आवश्यकता से अधिक बोलने पर शिष्टता-शालीनता की मर्यादाओं का उल्लंघन होता है। इससे मानसिक शक्तियां निर्बल होता हैं और स्नायुतंत्र पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। दीर्घकाल तक ऐसी स्थिति बनी रहे, तो अनेक प्रकार की मानसिक विकृतियां एवं शारीरिक रोगों का पनपना शुरू हो जाता है। वाचाल व्यक्ति का व्यक्तित्व उछला और उपहासास्पद माना जाता है। कोई भी उस पर विश्वास नहीं करता। अविश्वास एक ऐसी सजा है, जिसे सहन कर पाना अत्यन्त कठिन है। वाचाल पर अविश्वास हो भी क्यों न? क्योंकि यह कब, कहां और क्या बोल जायेगा-कोई भरोसा नहीं। अनवरत् और सतत् बोलने की यह वाचाल वृत्ति किसी विषय पर गंभीर चिन्तन नहीं करने देती, क्योंकि चिन्तन के लिए मन को विराम चाहिए। गंभीर विचार एवं चिन्तन के लिए मन को शान्त एवं मौन रहने की जरूरत है।

सृजनशील विचार:- मौन में मन सहज, शान्त एवं उर्वर होती है और सृजनशील विचारों को ग्रहण कर पाता है, अतः मौन मात्र चुप रहने की अवस्था नहीं है। मौन का अभ्यास करके मन स्थिर एवं प्रशान्त होता है। प्रशान्त मन समस्त मानसिक शक्तियों का द्वार-देहरी होता है। सिध्द पुरुष मन की इस महत्ता से परिचित होने के कारण सार्थक वचन बोलते हैं, जो मंत्र के समान प्रभावोत्पादक होते हैं। मौन नितान्त असम्भव जान पड़ने वाले कार्यों को सम्भव बनाता है, क्योंकि मौन एक शक्ति है, जो प्रकृति की अजस्र धारा में सतत् प्रवाहित होता है। पूर्ण भाव की दशा में मन व्यष्टि से समष्टि का दिव्य बोध करता है। मौन में मन का अन्तद्र्वन्द्व समाप्त हो जाता है और वह प्रभु की ओर उन्मुख हो जाता है तथा निरन्तर श्रेष्ठता एवं दिव्यता का चिन्तन करता है।

(संत निरंकारी से साभार)

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