सेहत की फजीहत: पान मसाला

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तोरणों और झालरों की तरह टंगे हुए पान मसालों व जर्दे के रंग बिरेंगे आकर्षक पाउच, आजकल अधिकांश पान व परचून की दुकानों तथा चाय स्टालों की शोभा बढ़ाते हुए देखे जा सकते हैं। दुकानदार इन्हें अपनी दुकानों पर बड़े यत्न से सजाकर ग्राहकों को, विशेषकर किशोर, युवा व बच्चों को आकर्षित करना चाहते हैं। राह चलते लोगों और पान के शौकीनों की नजरें जब इन पाउचों पर पड़ती है तो वे एक बारगी इन्हें सेवन करने का लोभ संवरण नहीं कर पाते। लेकिन बाद में दोस्तों की मान-मनावन की कद्र करते हुए यही पाउच आवश्यकता के रूप में अंगीकार कर लिये जाते हैं। धीरे-धीरे यही आवश्यकता आदत में बदल जाती है।

विज्ञापनों की चकाचैंध: पान मसाले की ईजाद को बहुत ज्यादा समय नहीं हुआ है। मगर आकर्षक विज्ञापनों की चकाचैंध और योजनबध्द प्रचार-प्रसार ने इस उत्पाद को एक अच्छा खासा बाजार उपलब्ध करा दिया है। कानपुर से शुरू हुए इस पान मसाले का सफर अब तक अनगिनत मंजिलें लांघ चुका है। बाजारों में एक से एक लुभावने नामों वाले पान मसालों के ब्रांडों की भरमार है। हर ब्रांड एक नये स्वाद, नये जायके का वादा करता है।

भारतीय समाज में इसकी पहुंच कितने भीतर तक हो चुकी है। इसका अंदाजा हमें हर महफिल और सभा, चाहे वह विवाह का अवसर हो या राजनैतिक मंच, साहित्यिक गोष्ठी हो या कवि सम्मेलन, वहां पान मसाले के चमचमाते डिब्बे या पाउच की मौजूदगी से हो जायेगा। हालांकि सिगरेट के सेवन की भांति पान मसाला चबाना भी स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। इस चेतावनी के बावजूद आज तकरीबन एक करोड़ व्याक्ति इन पान मसालों का उपयोग कर रहे हैं।

सफर में समय गुजारने और शौकिया तौर पर शुरू करके इसे चखने के बाद यह शीघ्र ही दैनिक आदत में शामिल हो जाता है और फिर इसके बिना रह पाना उस व्यक्ति के लिये उतना ही मुश्किल हो जाता है जितना शराब, अफीम या नशीली दवाओं के बिना। ज्यादतर युवक इसके जायकेदार जाल में इसलिए फंस जाते हैं कि उन्हें लगता है- इसमें तम्बाकू तो है नहीं या फिर वे तंबाकू को धूम्रपान के रूप में सेवन तो कर नहीं रहे हैं, फिर नुकासन क्या है? यही सोच गलत है। पान मसाला भी मुंह और गले में कैंसर पैदा करता है तथा कई अन्य व्याधियों को जन्म दे सकता है। क्योंकि पान मसाला में तम्बाकू के अलावा सुपारी, कत्था, चूना, मैंथोल, इलायची, लौंग आदि तथा सुरूर पैदा करने वाले कई घटक भी मिलाए जाते हैं।

तम्बाकू युक्त पान मसाला खाने से कैंसर होने की संभावना महज कपोल कल्पित नहीं है। पटना मेडिकल कालेज के डा.एस.के. अग्रवाल तथा डा.पी.के. डीडवानिया ने इस विषय पर काफी शोध किये हैं। उनके अनुसार भारत के कैंसर रोगियों में 35 प्रतिशत रोगी मुख, गले या जीभ के कैंसर से ग्रस्त हैं और उनमें औरतों की संख्या भी कम नहीं है। उनके शोध के परिणामों के अनुसार मुंह में कैंसर साधारणतया उस स्थान पर होता है जहां तम्बाकू युक्त पान मसाला या पान लम्बे समय तक रखा जाता है। प्रारंभ में इसकी शुरुआत एक छाले के रूप में होती है। जो काफी समय तक ठीक नहीं होता। लोग इसे चूने के कारण उत्पन्न छाला समझते रहते हैं। दरअसल यह फाइब्रोसिस रोग है। इसके कारण जबड़े का खुलना धीरे-धीरे कम हो जाता है। फाईब्रोसिस रोग ही बढ़ते-बढ़ते कैंसर का भयानक रूप धारण कर लेता है। इसी बात की पुष्टि गुजरात के कैंसर शोध अनुसंधान केंद्र के वैज्ञानिकों ने भी की है।

कैंसर का खतरा: भारत में कुल कैंसरग्रस्त लोगों में से आधे पुरुष और चैथाई महिलाएं हैं। इनमें कैंसर का मुख्य कारण तम्बाकू या तम्बाकूयुक्त उत्पादों का सेवन है। बीड़ी, सिगरेट, सिगार, चुरुट, चुट्टा, हुक्का, पान, पान मसाला, गुंडी, गुड़ाखू, खैनी और सुंघनी जैसे तम्बाकूयुक्त उत्पादों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सेवन करने से मुख कैंसर, हदय रोग तथा तपेदिक जैसे रोग धीरे-धीरे जन्म लेते हैं। आज कल उत्पादित तम्बावरू का पांचवा हिस्सा बिना धुएं के स्वरूपों में उपयोग में लाया जाता है। इसमें अधिकतर लोग पान में या पान मसालों के रूप में इसका सेवन करते हैं। सर्वेक्षणों के अनुसार भारत में 50 प्रतिशत पुरुष और 10 प्रतिशत महिलाएं तम्बाकूयुक्त पान मसाले का सेवन करते हैं। विशेष रूप से 20 और 25 वर्ष की आयु वर्ग के युवक और युवतियां इसकी गिरफ्त में आते जा रहे हैं।

अत्यधिक तम्बाकूयुक्त पान मसाला चबाने से जीभ की स्वाद कलिकाएं नष्ट हो जाती है तथा स्वाद का ज्ञान नहीं रह जाता है। उच्च रक्तचाप व हृदय रोग भी कुछ व्यक्तियों में इनसे उत्पन्न होते देखे गये हैं। लेकिन सर्वाधिक घातक है मुंह, गले या जीभ का कैंसर, जो तम्बाकू में पाये जाने वाले एल्कोहल पदार्थों के कारण होता है। ये पदार्थ मुंह में खाते ही लार के साथ शीघ्रता से घुल जाते हैं। मुंह में घाटी द्वार के आसपास श्लेष्मा झिल्ली अतिसंवेदनशील होती है जो तम्बाकू के एल्केकाइड से प्रभावित होकर तंत्रिका तंत्र पर प्रभाव डालते हैं। प्रारंभ में हल्के-हल्के चक्कर आना भी इसी कारण होता है। मुंह में लम्बे समय तक तम्बाकू युक्त पान मसाले को रखने से दांतों के इनेमल का उतर जाना, पीला पड़ना, अधिक ठंडे और गर्म खाद्य पदार्थों के प्रति अति संवेदनशीलता उत्पन्न हो जाना प्रारंभिक लक्षण के रूप में प्रकट होते हैं। अमेरिका के राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान संस्थान ने तम्बाकू में पाये जाने वाले कैंसरवध्र्दक पदार्थों का पता लगाया है जो घुलित अवस्था में सक्रिय होते हैं उसमें से कुछ प्रमुख हैं एन- नाइट्रोसोनोर निकोटिन, एन-नाइट्रोसोएनाबेसिन, एननाइट्रोसोएनाटेबिन, एन- नाइट्रोसोमोरफिलिन तथा एनएमओआई।

व्याधियों को निमंत्रण: ये तत्व लार में आसानी से घुल जाते हैं तथा कैंसरग्रस्त कोशिकाओं का निर्माण करते हैं। मुंह में तम्बाकू रखने से रक्त में इसकी मात्रा 5000 से 14000 पीपीबी (सूक्ष्म मात्रा मापन की इकाई) तक बढ़ जाती है। पान मसालों के साथ चबाये जाने वाले तंबाकू का प्रभाव कितना घातक है यह उपरोक्त अनुसंधान से जाहिर होता है। पान मसालों में उपस्थि मेंथोल नामक तत्व भी मुख कैंसर के लिये जिम्मेदार है। 1988 के नियम के अनुसार पान मसाले की एक किलोग्राम सामग्री में केवल 0.3 ग्राम मेंथोल मिलाया जाना चाहिए मगर निर्माता पान मसाले का स्वाद बढ़ाने के लिए एक किलो पान मसाला तैयार करते हेतु 15 गुना अधिक (4.5 ग्राम) मेंथोल मिला देते हैं। कुछ लोगों का मानना है कि पान मसाला खाने से तन में चुस्ती-फुर्ती आती है। यही भावनात्मक अनुभूति का मजा पान मसाला खाने के लिये लोगों को उकसाता है किन्तु थोड़ी देर के फुर्तीलेपन व आनंद के लिये पान मसाले का सेवन करते समय वे यह भूल जाते हैं कि यह जहर उनके बदन में उतर कर पूरे शरीर में घुलता जा रहा है। बाजार में बिकने वाले अधिकांश पाउचों पर उनके लुभावने नाम के अतिरिक्त न तो उसके उत्पादक का ठीक से अता-पता होता है ओर न ही उसमें मिलाये गये घटकों (कम्पोनेंट्स) का व्यौरा।

नशा और खुमारी पैदा करने के लिये कुछ पाउचों में तो धूतरे के अर्क का प्रयोग भी सीमित मात्रा में होने लगा है। ताकि सेवनकर्ता को एक तरह का सुरूर बना रहे और वह उस पाउच-विशेष का गुलाम बनता जाए। आज ऐसे पाउचों की तो बाजार में बाढ़ सी आ गयी और इन पाउचों का निशाना खासकर किशोर और युवा पीढ़ी बनी हुई है। कई बड़े शहरों में त इन पाउचों की आड़ में नशीले ड्रग्स का अवैध धंधा भी फल-फूल रहा है। आज उनसे कालेद कैंटीन, बस स्टेशन एवं रेलवे प्लेटफार्म अछूते नहीं हैं। मुख-शुध्दि के लिये सौंफ, इलायची, गुलकंद व लौंग इत्यादि स्वास्थ्यवर्धक पान मसालों का सेवन करने वाली बात तो फिर भी समझ में आती है लेकिन इन पाउचों के अंदर भरा कूड़ा-कचरा अपने पेट में डालना अनेक व्याधियों को निमंत्रण देता है। महाविद्यालयीन परिसरों में इस तरह के पाउचों का प्रचलन एक फैशन बनता जा रहा है। इस फैशन की दौड़ में युवतियां भी पीछे नहीं हैं। अपने को आधुनिकता के रंग में रंगने वाली युवतियां ऐसे पाउचों की पहुंच से अछूती नहीं है। चैंकाने वाली बात है कि भारत जैसे देश में प्रतिवर्ष अरबों रुपये का पान मसाला बेचा जाता है और इसका सर्वाधिक सेवन बिहार, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र, राजस्थान व दिल्ली में किया जाता है। यदि बेरोकटोक यही चलता रहा तो न जाने और कितनी तरह से यह बाजार में बेचा जाने लगेगा। तब साथ में आएंगी और भी अनेक बीमारियां। अतः सरकार को चाहिये कि समय रहते ही इस मीठे जहर के उत्पादन और उपयोग पर रोक लगाने के लिये कोई ठोस कदम उठाए।

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