जम्मू-कश्मीर : विधानसभा भंग करने के बाद क्यों विवादों के केंद्र में आए राज्यपाल

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Jammu-&-Kashmir-Assembly

-सुभाष चंद्र-

जम्मू कश्मीर में पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती द्वारा सरकार बनाने का दावा पेश किए जाने के कुछ ही देर बाद, जम्मू कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने राज्य विधानसभा को भंग कर दिया। ऐसा करते हुए उन्होने कहा कि जम्मू-कश्मीर के संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत यह कार्रवाई की गयी है। एक आधिकारिक बयान से यह कहा गया। इससे पूर्व जम्मू कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने कांग्रेस और नेशनल कान्फ्रेंस के समर्थन से जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने का दावा पेश  किया था।

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राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने जम्मू-कश्मीर विधानसभा भंग कर दी। अब राज्य में नए सिरे से चुनाव होंगे। अगर जानकारों की माने तो यह तीनों दलों द्वारा सूबे की विधानसभा भंग कराने का ’प्लान’ था। दरअसल, पीडीपी ने जैसे ही राज्यपाल सत्यपाल मलिक के पास राज्य में सरकार बनाने का दावा पेश किया उसके कुछ घंटे बाद ही राज्यपाल ने विधानसभा ही भंग कर दी। कांग्रेस, नेशनल कॉन्फेंस और पीडीपी तीनों इसे अपने फायदे से जोड़ कर देख रही है क्योंकि बीजेपी फिलहाल तो राज्य में चुनाव नहीं चाहती थी।

राज्यपाल सत्यपाल मलिक की ओर से विधानसभा भंग करने की कार्रवाई के बाद राज भवन ने देर रात एक बयान जारी कर इस पर राज्यपाल का रुख स्पष्ट किया है। बयान में कहा गया है कि राज्यपाल ने चार अहम कारणों से तत्काल प्रभाव से विधानसभा भंग करने का निर्णय लिया, जिनमें ’व्यापक खरीद फरोख्त’ की आशंका और ’विरोधी राजनीतिक विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ आने से स्थिर सरकार बनना असंभव’ जैसी बातें शामिल हैं। राज्यपाल ने एक आधिकारिक विज्ञप्ति के जरिए विधानसभा भंग करने की सूचना दी। राजभवन ने बाद में एक बयान में कहा कि राज्यपाल ने यह निर्णय अनेक सूत्रों के हवाले से प्राप्त सामग्री के आधार पर लिया।

विरोधी राजनीतिक विचारधाराओं वाली पार्टियों के साथ आने से स्थाई सरकार बनना असंभव है। इनमें से कुछ पार्टियों तो विधानसभा भंग करने की मांग भी करती थीं। पिछले कुछ वर्ष का अनुभव यह बताता है कि खंडित जनादेश से स्थाई सरकार बनाना संभव नहीं है। ऐसी पार्टियों का साथ आना जिम्मेदार सरकार बनाने की बजाए सत्ता हासिल करने का प्रयास है। व्यापक खरीद-फरोख्त होने और सरकार बनाने के लिए बेहद अलग राजनीतिक विचारधाराओं के विधायकों का समर्थन हासिल करने के लिए धन के लेन-देन होने की आशंका की रिपोर्टें हैं। ऐसी गतिविधियां लोकतंत्र के लिए हानिकारक हैं और राजनीतिक प्रक्रिया को दूषित करती हैं।

तीसरा कारण है कि बहुमत के लिए अलग-अलग दावे हैं, वहां ऐसी व्यवस्था की उम्र कितनी लंबी होगी, इस पर भी संदेह है। जम्मू-कश्मीर की नाजुक सुरक्षा व्यवस्था में सुरक्षा बलों के लिए स्थाई और सहयोगात्मक माहौल की जरूरत है। ये बल आतंकवाद विरोधी अभियानों में लगे हुए हैं और अंततः सुरक्षा स्थिति पर नियंत्रण पा रहे हैं।

महबूबा मुफ्ती ने चिट्ठी में बहुमत का जो दावा किया उसकी कोई पुख्ता तस्वीर नहीं पेश की। नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के समर्थन को लेकर मीडिया रिपोर्ट्स का जिक्र किया और कहा कि उन्हें सरकार बनाने का मौका दिया जाए। महबूबा के दावे के बाद भी ना तो नेशनल कॉन्फ्रेंस और ना ही कांग्रेस ने सामने आकर महबूबा का समर्थन किया। महबूबा के दावे को पलीता लगाने का काम उनकी पार्टी के बागी विधायकों ने भी किया। पीडीपी विधायक इमरान अंसारी ने दावा किया कि उनके साथ 18 विधायक हैं। इसके बाद पीपुल्स कॉन्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने पीडीपी के बागी विधायकों और बीजेपी के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश कर दिया।

उधर, विधानसभा भंग किए जाने की घोषणा से कुछ ही देर पहले पीपुल्स कान्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन ने भी भाजपा के 25 विधायकों तथा 18 से अधिक अन्य विधायकों के समर्थन से जम्मू कश्मीर में सरकार बनाने का दावा पेश किया था। लोन ने राज्यपाल को एक पत्र लिख कर कहा था कि उनके पास सरकार बनाने के लिए जरूरी आंकड़ें से अधिक विधायकों का समर्थन है।

उनका कहना था, ‘‘जम्मू कश्मीर में सरकार गठन के लिए फोन पर हुई हमारी बातचीत के बाद मैं जम्मू कश्मीर राज्य विधानसभा में भाजपा और 18 अन्य निर्वाचित सदस्यों के समर्थन से सरकार बनाने का औपचारिक रूप से दावा पेश करता हूं…।’’ लोन ने कहा था कि जब उनसे कहा जाएगा तब वह भाजपा विधायक दल तथा अन्य सदस्यों के समर्थन का पत्र पेश करेंगे।

गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर में भगवा पार्टी द्वारा समर्थन वापस लिये जाने के बाद पीडीपी-भाजपा गठबंधन टूट गया था जिसके बाद 19 जून को राज्य में छह महीने के लिए राज्यपाल शासन लगा दिया गया था। राज्य विधानसभा को भी निलंबित रखा गया था ताकि राजनीतिक पार्टियां नई सरकार गठन के लिए संभावनाएं तलाश सकें।
सूत्रों का कहना है कि तीनों पार्टियों द्वारा साथ आना सरकार बनाने की कोशिश कम और राज्यपाल तथा बीजेपी पर दबाव बनाने की कोशिश ज्यादा था। सूत्रों का कहना है कि इस पूरी कवायद के पीछे इन तीनों पार्टियों का मूल उद्देश्य भी विधानसभा भंग कराना ही था। बीते दिनों राज्य में हुए पंचायत चुनाव में वोटरों की भागीदारी के बाद क्षेत्रीय पार्टियों का आकलन गलत साबित हुआ है।

कांग्रेस इसका स्वागत तो कर रही है लेकिन बोल रही है बीजेपी अपने जाल में फंस गई है। एक अफवाह के आधार पर सरकार ने राज्य में विधानसभा भंग करने का फैसला ले लिया। पीपुल्स कान्फ्रेंस के नेता सज्जाद लोन बीजेपी के ही भरोसे सरकार बनाने का दावा कर रहे थे लेकिन बीजेपी अब किनारा कर चुकी है। अब पार्टी खुश है कश्मीर में सियासत करने वालों की सरकार नहीं बन रही है ।

जम्मू कश्मीर में विधानसभा भंग करने को लेकर नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला ने राज्यपाल सत्यपाल मलिक पर निशाना साधा है। राज्यपाल कार्यालय की तरफ से कहा गया था कि फैक्स मशीन खराब थी और सरकार बनाने के दावे को लेकर उनके पास किसी तरह का फैक्स नहीं आया।

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“राज्यपाल के इस जवाब पर उमर अब्दुल्ला ने कहा कि पहली बार लोकतंत्र की हत्या के लिए फैक्स मशीन वजह बना है, उन्होंने राज्यपाल के बयान का मजाक उड़ाते हुए कहा कि राज्यपाल के कार्यालय में लगी फैक्स मशीन एकतरफा मशीन है, इस मशीन में आउटगोइंग तो है लेकिन इनकमिंग नहीं है और इस मशीन की जांच की जानी चाहिए। अब्दुल्ला ने राज्यपाल के उस दावे की जांच की मांग कि जिसमें उन्होंने कहा था कि जम्मू-कश्मीर में सरकार गठन के लिए खरीद-फरोख्त और पैसे का इस्तेमाल किया जा रहा था।”

https://twitter.com/OmarAbdullah/status/1065477403856826368

इससे पहले राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने भी विधानसभा भंग किए जाने और फैक्स मशीन पर अपनी तरफ से सफाई दे दी है, उन्होंने कहा कि उनको अगर फैक्स मिला भी होता तो उनका फैसला वही रहता जो किया गया है। विधानसभा भंग किए जाने को लेकर जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने कहा कि विधायकों की खूब खरीद-फरोख्त हो रही थी, दल-बदल के जरिए सरकार बनाने की अनुमति नहीं दी जा सकती, उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुसार काम किया, राज्य के हित में विधानसभा भंग की।

देश के अन्य सभी राज्यों में राजनीतिक दलों के सरकार नहीं बना पाने या राज्य सरकारों के विफल होने की स्थिति में राष्ट्रपति शासन लगाया जाता है लेकिन जम्मू-कश्मीर में मामला थोड़ा अलग है। यहां राष्ट्रपति शासन नहीं बल्कि राज्यपाल शासन लगाया जाता है। दरअसल जम्मू-कश्मीर के संविधान के अनुच्छेद 92 के तहत राज्य में छह महीने के लिए राज्यपाल शासन लागू किया जाता है, हालांकि देश के राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद ही ऐसा किया जा सकता है। देश के अन्य राज्यों में राष्ट्रपति शासन संविधान के अनुच्छेद 356 के तहत लगाया जाता है।

भारत के संविधान में जम्मू-कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा प्राप्त है। यह देश का एकमात्र राज्य है जिसके पास अपना खुद का संविधान और अधिनियम हैं। राज्यपाल इस दौरान विधानसभा या तो निलंबित करते हैं या इसे भंग भी कर सकते हैं। अगर छह महीनों के अंदर राज्य में संवैधानिक तंत्र बहाल नहीं हो जाता, तब राज्यपाल शासन की समय सीमा को फिर बढ़ा दिया जाता है। बता दें कि जम्मू-कश्मीर में पहली बार 1977 में राज्यपाल शासन लगाया गया था। तब कांग्रेस ने शेख़ अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस से अपना समर्थन वापल ले लिया था। अब तक राज्य में आठ बार राज्यपाल शासन लग चुका है।

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