समाज, सियासत का ये कैसा रंग हैं सबरीमाला को लेकर!

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Sabrimala-Mandir
सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दे दी है। कोर्ट ने साफ कहा है कि हर उम्र वर्ग की महिलाएं अब मंदिर में प्रवेश कर सकेंगी.

-कुमारी मीनू- Kumari Minu

अभी पूरे देश में धर्म, धार्मिकता और महिलाओं को लेकर चर्चा हो रही है। केंद्र में है सबरीमाला विवाद। विवाद हो और राजनीति न हो, यह भला कैसे संभव है। सो, ऐसा ही हो रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को दरकिनार कर आस्था और धर्म की जयकार की जा रही है। इसी बीच सवाल जेहन में उठता है कि आखिर धर्म क्या है? मेरे विचार से धर्म के मुख्यतः दो आयाम हैं। एक है संस्कृति, जिसका संबंध बाहर से है। दूसरा है अध्यात्म, जिसका संबंध भीतर से है। धर्म का तत्व भीतर है, मत बाहर है। तत्व और मत, दोनों का जोड़ धर्म है। तत्व के आधार पर मत का निर्धारण हो, तो धर्म की सही दिशा होती है। मत के आधार पर तत्व का निर्धारण हो, तो बात कुरूप हो जाती है।

दरअसल, अभी देश में महिलाएं सबसे अधिक चर्चा में हैं। वह भी उन खासियत के लिए, जिससे प्रकृति ने उन्हें नवाजा है। लेकिन, यह खासियत आज उन्हीं महिलाओं के अधिकारों के आड़े आ रही है। आप सभी जानना चाहेंगे महिलाओं की वह खासियत है जिसके कारण वे दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है या राजनीतिक दलों ने अपना उल्लू सीधा करने के लिए इसको मुद्दा बना दिया है। महिलाओं में विद्यमान वह खासियत है उनका ‘मासिक धर्म’। इस शब्द को सुनकर संभव है कि सभी इस विषय पर बात करने से कतराएंगे, लेकिन वक्त का तकाजा है कि हम इस पर खुलकर बात करें। शर्म-ओ-हया को अलग रखकर खुलकर बात करें और अपवित्र बताकर हमारे अधिकारों का गला घोंटनेवालों तथाकथित धर्म के ठेकेदारों को आईना दिखाएं।

‘मासिक धर्म’, जिसने अपने आप में धर्म को समेटा हुआ है। धर्म का अर्थ होता है, धारण, अर्थात जिसे धारण किया जा सके। धर्म, कर्म प्रधान है। गुणों को जो प्रदर्शित करे, वह धर्म है। धर्म को गुण भी कह सकते हैं। अगर इन शब्दों पर गौर करें और हमारे ‘मासिक धर्म’ को ‘मासिक गुण’ कहे, तो गलत नहीं होगा। जिस तरह सहनशीलता, सामंजस्यता, सद्भावना इत्यादि कई गुण महिला की शोभा बढ़ाते हैं, ठीक वैसे ही मासिक धर्म भी महिला की शोभा बढ़ाते हैं, ऐसा कहना कोई गुस्ताखी नहीं होगी।

अब प्रश्न उठता है कि जब यह मासिक धर्म किसी महिला का गुण है, तो वह इससे अपवित्र कैसे हो सकती है! शायद इसका जवाब कोई पुरुष देने की कोशिश नहीं करेगा, क्योंकि उसे पता है कि जब यह गुण उसमें है नहीं, तो वह उसका आकलन कैसे कर सकता है। परंतु यह बात इन अक्ल के मारे पुरुषों को कौन समझाए। पवित्रता की परिभाषा गढ़नेवाले ये पुरुष  कौन हैं, जो इस पर अपना मंतव्य रख सके। मनोविज्ञान में एक स्थिति होती है। जब किसी व्यक्ति के पास कुछ नहीं होता, तो वह दूसरे व्यक्ति के पास रहनेवाली चीजों को भी गलत ही कहता है। दूसरे जब तक अपने पर कोई परेशानी नहीं आती, तब तक लोग दूसरे की परेशानियों को नहीं समझ पाते। संभवतः यही सब हो रहा है सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का विरोध करनेवाले पुरुष और महिलाओं के साथ।

सबरीमाला मंदिर में हरेक उम्र की महिलाओं के प्रवेश पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद भी लागातार विरोध का दौर जारी है। इस कारण महिलाएं मंदिर में प्रवेश नहीं कर पा रही हैं। इसका विरोध परंपरा के नाम पर किया जा रहा है। विरोध करने वाले पुरुष हैं और उनका साथ महिलाएं भी दे रही हैं। संभव है कि उन पुरुषों का साथ देनेवाली महिलाएं वे हैं, जिनके मन में कुछ गलत परंपराएं बचपन से डाल दी गई हैं। या फिर ऐसी महिलाएं, जिनके पास समझने की ताकत झीण हो चुकी है। खैर, आग में घी डालने का काम हमारे राजनेताओं  उनकी करते हैं, जिनको सबसे अधिक मिर्ची लगी हुई है।

केरल के प्रसिद्ध सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के जाने का विरोध किया जा रहा है। इस मंदिर के देवता भगवान अयप्पा हैं। माना जाता है कि भगवान अयप्पा ब्रह्मचारी हैं। इस कारण वहां महिलाओं का प्रवेश वर्जित है। अनुमान है कि 10 वर्ष से लेकर 50 वर्ष तक महिलाओं को मासिक धर्म के चक्र से गुजरना पड़ता है। इस कारण महिलाएं कथित रूप से ‘अपवित्र’ कही जाती हैं। 10 वर्ष से कम और 50 वर्ष से अधिक की महिलाएं जो मासिक धर्म से नहीं गुजरतीं, वह मंदिर में प्रवेश कर सकती हैं। यह तर्क समझ से परे है। अगर भगवान ब्रह्मचारी हैं, तो उन्हें सभी महिलाओं से दूर रहना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं है। लगता है, भगवान भी अब भेदभाव की नीति अपनाने लगे हैं।

मासिक धर्म को आधार मानकर पुरुषों द्वारा महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाई जा रही है। लेकिन, यहां भी पुरुषों का दोहरा चरित्र दिखता है। असम के गुवाहाटी से लगभग 8 किलोमीटर दूर स्थित है देवी सती का कामाख्या मंदिर। यह मंदिर रजस्वला माता की वजह से अधिक प्रसिद्ध है। यहां चट्टान के रूप में बनी योनि से रक्त निकलता है। इस मंदिर में हर साल अंबुवाची मेले का आयोजन किया जाता है। इस मेले में देशभर के तांत्रिक हिस्सा लेने आते हैं। ऐसी मान्यता है कि इन तीन दिनों में माता सती रजस्वला होती हैं और जल कुंड में पानी की जगह रक्त बहता है। इन तीन दिनों के लिए मंदिर के दरवाजे बंद रहते हैं। तीन दिनों के बाद बड़ी धूमधाम से इन्हें खोला जाता है। हर साल मेले के दौरान मौजूद ब्रह्मपुत्र नदी का पानी लाल हो जाता है। ऐसा माना जाता है कि ये पानी माता के रजस्वला होने का कारण होता है। हालांकि, इसके कई और तर्क दिए जाते हैं।

इतना ही नहीं, यहां दिया जाने वाले वाला प्रसाद भी रक्त में डूबा कपड़ा होता है। ऐसा कहा जाता है कि तीन दिन जब मंदिर के दरवाजे बंद किए जाते हैं, तब मंदिर में एक सफेद रंग का कपड़ा बिछाया जाता है, जो मंदिर के पट खोलने तक लाल हो जाता है। इसी लाल कपड़े को इस मेले में आए भक्तों को प्रसाद स्वरूप दिया जाता है। इस प्रसाद को अंबुवाची प्रसाद भी कहा जाता है। रक्त में डूबे हुए प्रसाद रूपी इस कपड़े की महत्ता इतनी अधिक मानी जाती है कि कपड़े को ऑनलाइन तक मंगवाया जाता है। इस मंदिर में कोई भी मूर्ति नहीं है। यहां सिर्फ योनि रूप में बनी एक समतल चट्टान को पूजा जाता हैं। मूर्तियां साथ में बने एक मंदिर में स्थापित की गई हैं। मंदिर में पशुओं की बली भी दी जाती है, लेकिन किसी भी मादा जानवर की बलि नहीं दी जाती है। अब एक ही देश में दो तरह की परंपराए कहां तक जायज कही जा सकती हैं।

इसके साथ ही मन में सवाल यह भी उठता है कि मासिक धर्म में महिलाओं को पूजा करने की मनाही क्यों होती है, जबकि यह एक प्राकृतिक घटना है। भारत के ज्यादातर हिस्सों में हिंदू और मुसलमान तबकों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के साथ अछूतों की तरह का व्यवहार भी इनमें से एक है। हालांकि, इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। बस परंपरा के नाम पर अब भी यह चला आ रहा है। महिला रोग विशेषज्ञ डॉ. रंजना राय कहती हैं कि माहवारी के दौरान महिलाओं पर तरह-तरह की पाबंदियां लगाने का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है। विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों में यह पारंपरिक मान्यता है कि इस दौरान महिला को घर के सामान्य कामकाज से अलग रखना चाहिए। लेकिन, यह सांस्कृतिक और धार्मिक परंपरा का हिस्सा है। विज्ञान में इस बारे में कोई तथ्य या जवाब नहीं मिलता। कहा जाता है मासिक धर्म के दिनों में महिलाएं असहनीय पीड़ा से गुजरती हैं, इसलिए उन दिनों में महिलाओं को अन्य काम करने से रोका जाता है, ताकि वे आराम कर सकें। लेकिन, परंपरा के ठेकेदारों ने इसे कुछ और ही पहचान दे दी है।

हालांकि, बदलते समय के साथ अब कुछ इलाकों में इस हालत में धीरे-धीरे बदलाव आ रहा है। इसकी एक वजह महिलाओं का कामकाजी होना है, तो दूसरी वजह पारिवारिक ढांचे का सिकुड़ना है। अब संयुक्त परिवारों का दौर धीरे-धीरे खत्म हो रहा है। ऐसे में कोई महिला अगर तीन-चार दिनों तक खाना नहीं पकाए, तो घर का काम कैसे चलेगा। छोटे परिवारों में अपने पति और बच्चों के अलावा मेहमानों को खाना खिलाने की जिम्मेदारी महिला पर ही होती है। इसलिए यह सवाल उठने लगा कि अगर वह खाना खिला सकती है, तो पका क्यों नहीं सकती। कामकाजी महिलाओं को तो माहवारी के दौरान भी दफ्तर जाना पड़ता है। अब वे हर महीने तो इसके लिए छुट्टी लेकर घर नहीं बैठ सकतीं। जब महिलाएं मासिक धर्म के दौरान हरेक काम कर सकती हैं, तो पूजा-पाठ या मंदिरों में जाने का भी उनका अधिकार बनता है। अगर यह अधिकार उनको नहीं मिलता है, तो यह उनके अधिकारों का हनन है।

अगर आज के समय में भी धर्म के ठेकेदार अपनी हठधर्मिता पर अड़े रहे, तो उनको और प्रश्नों का जवाब देने के लिए भी तैयार रहना चाहिए। सवाल उठता है कि क्या रजस्वला होने के बाद भी देवी अपवित्र नहीं होतीं। जो व्यक्ति सबरीमाला में मंदिर के प्रवेश का विरोध करते हैं, वह कामाख्या देवी के मंदिर के बारे में क्या विचार रखते हैं। क्या कामख्या मंदिर भी अपवित्र है! इसका जवाब पुरुषों को देना चाहिए। अपनी दोमुंही बातों को ज्यादा प्रश्रय न देकर इसका जवाब देना ही होगा कि सबरीमाला और कामाख्या मंदिर में क्या सत्य है और क्या झूठ!

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