सपा-बसपा का गठबंधन जरूरी नहीं बल्कि, मजबूरी हो गया था

58
Mayawati And Akhilesh Yadav Joint Press Confrence
coalition announcement in UP: SP-BSP to contest 38-38 seats

-बीपी गौतम-

समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का राजनैतिक रिश्ता 2 जून 1995 को टूटा था, जिसमें 12 जनवरी 2019 को पुनः गांठ लगा दी गई है। खास बात सिर्फ इतनी ही है कि अखिलेश यादव और मायावती ने संयुक्त रूप से पत्रकार वार्ता आयोजित कर गांठ बांधने की घोषणा कर दी, शेष सब वही है, जो आम जनता को पहले से पता है। गठबंधन होने की खबरें पहले से ही आ चुकी थीं, सीटों के बंटवारे के बारे में भी पहले से ही ज्ञात था। बड़ी बात यह है कि पिछले दिनों सतीश मिश्रा द्वारा किये गये खंडन के कारण गठबंधन न होने की अफवाहें चल रही थीं, उन पर अब विराम लग गया है। अखिलेश और मायावती ने गठबंधन के जो कारण बताये, वह भी स्वाभाविक ही हैं। स्वयं को जिंदा रखने के लिए कांग्रेस के विरुद्ध भी तर्क गढ़ने ही थे, सो बोल दिए गये, इस गठबंधन का असर क्या होगा, यह तो चुनाव बाद ही पता चल सकेगा लेकिन, हाल-फिलहाल संभावनायें बहुत अच्छी नहीं दिख रही हैं।

Mayawati And Akhilesh Yadav Joint Press Confrence
coalition announcement in UP: SP-BSP to contest 38-38 seats

जातिवादी राजनीति के पुरोधा सपा-बसपा मुस्लिम वोट के साथ ही राजनीति में ठहर सकते हैं। राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम वर्ग का झुकाव कांग्रेस की ओर बढ़ रहा है। मुस्लिम वर्ग में यह बात अब आम तौर पर मानी जाने लगी है कि राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा का विकल्प कांग्रेस ही हो सकती है। मुस्लिम वर्ग की बदल रही सोच वोट में तब्दील हो गई तो, सपा-बसपा के भविष्य पर ही प्रश्न चिन्ह लग सकता है। मुस्लिम वर्ग एक बार कांग्रेस के पाले में चला गया तो, उत्तर प्रदेश में प्रभावशाली अवस्था में भाजपा और कांग्रेस ही रह जायेंगे, सो स्वयं को बचाने के लिए सपा-बसपा का गठबंधन करना जरूरी नहीं बल्कि, मजबूरी हो गया था।

राजनीति में समय के अनुसार निर्णय लिया जाता है। विधान सभा चुनाव में अखिलेश यादव को कांग्रेस के साथ गठबंधन नहीं करना था पर, मनमानी करते हुए अखिलेश यादव ने कांग्रेस से गठबंधन किया। एक महीने पहले तक जो कांग्रेस उत्तर प्रदेश की बर्बादी का नारा लगा रही थी, वही कांग्रेस अखिलेश यादव का काम बोलता है वाला नारा लगाने लगी, ऐसे में आम जनता को दूर जाना ही था, साथ ही उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पास संगठन और समर्थक नहीं हैं, सो कांग्रेस के मिलन से न लाभ होना था और न ही हुआ। अखिलेश यादव की विधान सभा चुनाव में हार तय थी पर, कांग्रेस से न मिले होते तो, सम्मानजनक हार मिल सकती थी।

Mayawati Akhilesh

अब हालात बदल गये हैं। कुछ दिन पहले तक कांग्रेस हर तरह से जूझ रही थी। छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जीत मिलने से कांग्रेस का मनोबल बढ़ा है। आम जनता जीत के कारणों और वोट प्रतिशत पर मंथन नहीं करती, वह देखती है कि सरकार किसकी बनी है और इस दृष्टि से मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्य कांग्रेस ने हाल ही में झटके हैं, जिससे आम जनता को अब भाजपा की जीत चुनाव परिणाम आने से पहले निश्चित नजर नहीं आ रही। मध्य प्रदेश और राजस्थान भाजपा बचाने में सफल हो जाती तो, भाजपा की जीत को लेकर आम जनता पहले से ही आश्वस्त होती। चुनाव परिणामों को लेकर अब असमंजस की अवस्था बन गई है, जो कांग्रेस के लिए अच्छी स्थिति कही जायेगी।

इसके अलावा कांग्रेस आर्थिक संकट से जूझ रही थी पर, अब उसके पास धन की कोई कमी नहीं होगी। भाजपा से हर तरह से मुकाबला करने को कांग्रेस तैयार है। बड़े राज्यों में सरकार बनने से हर तरह से मदद मिलेगी, साथ ही चुनाव परिणामों को लेकर बनी असमंजस की अवस्था के चलते कांग्रेस को उद्योग जगत से भी भरपूर मदद मिलेगी। कांग्रेस अब हर दृष्टि से भाजपा के बराबर की योद्धा नजर आ रही है, वह हर क्षेत्र में भाजपा का न सिर्फ मुकाबला कर सकती है बल्कि, बराबर की टक्कर देने को तैयार है। लोकसभा के महासंग्राम का शंखनाद होते ही राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा और कांग्रेस की ही धूम रहने की संभावना है। जमीनी और हवाई, हर के माध्यमों पर भाजपा और कांग्रेस ही छाये हुए होंगे, प्रचार वार में सपा-बसपा चाह कर भी भाजपा और कांग्रेस का मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है, प्रचार माध्यमों का भी बड़ा असर होता है। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में भी भाजपा का विकल्प बनने में सफल हो गई तो, सपा-बसपा पर्दे के पीछे ही नजर आयेंगे।

mayawati

हाल-फिलहाल सपा-बसपा गठबंधन का लाभ वीवीआईपी सीटों पर ही मिलने की संभावना जताई जा सकती है। सैफई घराने के लोग नरेंद्र मोदी की लहर वाले 2014 के चुनाव में जीत गये थे। हालाँकि उस समय प्रदेश में सपा की सरकार भी थी, फिर भी वे गठबंधन के चलते 2019 के चुनाव में भी आसानी से जीत सकते हैं। अन्य क्षेत्रों में गठबंधन की गांठ शिवपाल सिंह यादव तोड़ने में कामयाब रह सकते हैं। आजम खान को अखिलेश यादव संतुष्ट करने में सफल नहीं हो पाए तो, वे भी मशविराती काउंसिल के बहाने कई क्षेत्रों में नुकसान पहुंचा सकते हैं, वे पहले से तैयार मुस्लिम वर्ग की गठबंधन से दूर जाने में मदद कर सकते हैं।

राजनैतिक दृष्टि से सबसे खराब हालात सपा और बसपा के लिए ही कहे जा सकते हैं। अगला चुनाव सपा-बसपा की जिंदगी निर्धारित करेगा। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वर्ग को लुभाने में कामयाब हो गई तो, सपा-बसपा पुनः जमीन नहीं खोज पायेंगे और मुस्लिम वर्ग गठबंधन से जुड़ गया तो, चुनाव परिणाम जो भी हो पर, सपा-बसपा की जमीन बची रहेगी, इसीलिए कांग्रेस के बिना गठबंधन बनाने का निर्णय सही है लेकिन, इस गठबंधन को सर्वशक्तिमान नहीं कहा जा सकता, इसलिए उत्साहित होने की अवस्था नहीं हैं।

 

कोई जवाब दें

Please enter your comment!
Please enter your name here