मानव इतिहास की सबसे भयावह गैस त्रासदी भोपाल गैस कांड

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भोपाल गैस कांड पूरी दुनिया के औद्योगिक इतिहास की सबसे बड़ी दुर्घटना है। तीन दिसंबर, 1984 को आधी रात के बाद सुबह यूनियन कार्बाइड की फैक्टरी से निकली जहरीली गैस (मिक या मिथाइल आइसो साइनाइट) ने हजारों लोगों की जान ले ली थी। मरने वालों की संख्या को लेकर मदभेद हो सकते हैं, लेकिन इन त्रासदी की गंभीरता को लेकर किसी को कोई शक, शुबहा नहीं होगा। इसलिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि मरने वालों की संख्या हजारों में थी। प्रभावितों की संख्या लाखों में हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

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उस मनहूस सुबह को यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर ‘सी’ में हुए रिसाव से बने गैस के बादल को हवा के झोंके अपने साथ बहाकर ले जा रहे थे और लोग मौत की नींद सोते जा रहे थे। लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर एकाएक क्या हो रहा है? कुछ लोगों का कहना है कि गैस के कारण लोगों की आंखों और सांस लेने में परेशानी हो रही थी। जिन लोगों के फैंफड़ों में बहुत गैस पहुंच गई थी वे सुबह देखने के लिए जीवित नहीं रहे।

Bhopal-Gas-Tragedyसरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दुर्घटना के कुछ ही घंटों के भीतर तीन हजार लोग मारे गए थे। हालांकि गैर सरकारी स्रोत मानते हैं कि ये संख्या करीब तीन गुना ज्यादा थी। इतना ही नहीं, कुछ लोगों का दावा है कि मरने वालों की संख्या 15 हजार से भी अधिक रही होगी। पर मौतों का ये सिलसिला उस रात शुरू हुआ था वह बरसों तक चलता रहा। यह तीन दशक बाद भी जारी है, जबकि हम त्रासदी के सबक से सीख लेने की कवायद में लगे हैं।

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जानकार सूत्रों का कहना है कि कार्बाइड फैक्टरी से करीब 40 टन गैस का रिसाव हुआ था और इसका कारण यह था कि फैक्टरी के टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाइल आइसोसाइनेट गैस से पानी मिल गया था। इस घटना के बाद रासायनिक प्रक्रिया हुई और इसके परिणामस्वरूप टैंक में दबाव बना। अंतत: टैंक खुल गया और गैस वायुमंडल में फैल गई।

इस गैस के सबसे आसान शिकार भी कारखाने के पास बनी झुग्गी बस्ती के लोग ही थे। ये वे लोग थे जो कि रोजीरोटी की तलाश में दूर-दूर के गांवों से आकर यहां पर रह रहे थे। उन्होंने नींद में ही अपनी आखिरी सांस ली। गैस को लोगों को मारने के लिए मात्र तीन मिनट ही काफी थे। कारखाने में अलार्म सिस्टम था, लेकिन यह भी घंटों तक बेअसर बना रहा। हालांकि इससे पहले के अवसरों पर इसने कई बार लोगों को चेतावनी भी थी।

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जब बड़ी संख्‍या में लोग गैस से प्रभावित होकर आंखों में और सांस में तकलीफ की शिकायत लेकर अस्पताल पहुंचे तो डॉक्टरों को भी पता नहीं था कि इस आपदा का कैसे इलाज किया जाए? संख्या भी इतनी अधिक कि लोगों को भर्ती करने की जगह नहीं रही। बहुतों को दिख नहीं रहा था तो बड़ी संख्या में लोगों का सिर चकरा रहा था। सांस लेने में तकलीफ तो हरेक को हो रही थी। मोटे तौर पर अनुमान लगाया गया है कि पहले दो दिनों में लगभग 50 हजार लोगों का इलाज किया गया।

जैसी कि आशंका थी कि शुरू में डॉक्टरों को ही ठीक तरह से पता नहीं था कि क्या इलाज किया जाए। शहर में ऐसे डॉक्टर भी नहीं थे, जिन्हें मिक गैस से पीड़ित लोगों के इलाज का कोई अनुभव रहा हो।  हालांकि गैस रिसाव के आठ घंटे बाद भोपाल को जहरीली गैसों के असर से मुक्त मान लिया गया, लेकिन वर्ष 1984 में हुई इस हादसे से भोपाल उबर नहीं पाया है। …और जब-जब तक इसकी याद रहेगी तब तक इसके उबरने की संभावना भी नहीं होगी।

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त्रासदी के दुष्प्रभाव जारी, आज की पीढ़ी भी है प्रभावित

33 साल बाद भी, गैस के संपर्क में आने वाले कई लोगों ने शारीरिक और मानसिक रूप से अक्षम बच्चों को जन्म दिया है। हालांकि लोग तो दशकों से, साइट को साफ करने के लिए भी लड़ रहे हैं, लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, 2001 में मिशिगन स्थित डॉव केमिकल के यूनियन कार्बाइड पर कब्जा करने के बाद कार्य धीरे हो गया।

मानवाधिकार समूह कहते हैं कि हजारों टन खतरनाक अपशिष्ट भूमिगत दफनाया गया है, और यहां तक की सरकार ने स्वीकार किया है कि क्षेत्र दूषित है। स्वस्थ को लेकर हालात कुछ ऐसे हैं की, भोपाल गैस कांड के बाद सरकार की ओर से बनाए गए गैस राहत विभाग में हर माह दर्जन भर आवेदन ऐसे आते हैं, जिसमें कैंसर के इलाज के लिए आर्थिक सहायता की मांग की जाती है।

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बता दें की इस गैस त्रासदी में पांच लाख से अधिक लोग प्रभावित हुए थे। हजारों लोग की मौत तो मौके पर ही हो गई थी। जिंदा बचे लोग कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रहे हैं। कैंसर एक अकेली बीमारी नहीं है, जिससे गैस प्रभावित लोग जूझ रहे हैं, सैकड़ों बीमारियां हैं। घटना के 33 साल बाद भी गैस कांड के दुष्प्रभाव खत्म नहीं हो रहे हैं।

34 साल बाद भी जारी है पुनर्वास, मुआवजे की लड़ाई

भोपाल गैस कांड के 34 साल पूरे होने के बाद भी इसकी जहरीली गैस से प्रभावित अब भी उचित इलाज, पर्याप्त मुआवजे, न्याय एवं पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति की लड़ाई लड़ रहे हैं। गैस पीड़ितों के हितों के लिये पिछले तीन दशकों से अधिक समय से काम करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला उद्योग संगठन के संयोजक अब्दुल जब्बार ने कहा, ‘हादसे के 34 साल बाद भी न तो मध्यप्रदेश सरकार ने और ना ही केन्द्र सरकार ने इसके नतीजों और प्रभावों का कोई समग्र आकलन करने की कोशिश की है, ना ही उसके लिए कोई उपचारात्मक कदम उठाए हैं।’

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उन्होंने कहा, ’14-15 फरवरी 1989 को केन्द्र सरकार और अमेरिकी कंपनी यूनियन कार्बाइड कारपोरेशन (यूसीसी) के बीच हुआ समझौता पूरी तरह से धोखा था और उसके तहत मिली रकम का हरेक गैस प्रभावित को पांचवें हिस्से से भी कम मिल पाया है। नतीजतन, गैस प्रभावितों को स्वास्थ्य सुविधाओं, राहत और पुनर्वास, मुआवज़ा, पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और न्याय इन सभी के लिए लगातार लड़ाई लड़नी पड़ी है।’

जब्बार ने बताया, ‘साल 2018 में भी गैस प्रभावितों के सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बहुत कम प्रगति होना गम्भीर चिन्ता का विषय रहा है।’ उन्होंने कहा कि फरवरी 1989 में भारत सरकार एवं यूसीसी में समझौता हुआ था, जिसके तहत यूसीसी ने भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर 470 मिलियन अमेरिकी डॉलर (715 करोड़ रुपये) दिए थे।

जब्बार ने कहा कि हमने उसी वक्त इस समझौते पर यह कह कर सवाल उठाया था कि इस समझौते के तहत मृतकों एवं घायलों की संख्या बहुत कम दिखाई गई है, जबकि वास्तव में यह बहुत अधिक है। इस पर 3 अक्टूबर 1991 को उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि यदि यह संख्या बढ़ती है तो भारत सरकार मुआवजा देगी।

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उन्होंने बताया कि इस समझौते में गैस रिसने से 3,000 लोगों की मौत एवं 1.02 लाख प्रभावित बताए गए थे, जबकि असल में 15,274 मृतक एवं 5.74 लाख प्रभावित लोग थे, जो इस बात से साबित होता है कि भोपाल में दावा अदालतों द्वारा वर्ष 1990 से 2005 तक त्रासदी के इन 15,274 मृतकों के परिजनों और 5.74 लाख प्रभावितों को 715 करोड़ रुपये मुआवजे के तौर पर दिए गए।

उन्होंने बताया कि इस समझौते में दिए गए मृतकों एवं घायलों की संख्या हकीकत में करीब पांच गुना अधिक होने पर उच्चतम न्यायालय के समक्ष वर्ष 2010 में अलग-अलग क्यूरेटिव याचिकाएं दायर की गई थीं, जिसमें समझौते की शर्तों पर सवाल उठाए गए थे और यह कहा गया कि समझौता मृतकों और पीड़ितों की बहुत कम आंकी गई संख्या पर आधारित था। याचिकाओं में मुआवजे में 7,728 करोड़ रुपये की अतिरिक्त बढ़ोतरी की मांग की गई है, जबकि 1989 की समझौता राशि मात्र 705 करोड़ रुपए की थी। याचिका स्वीकृत हो गई है, पर सुनवाई शुरू नहीं हुई है।

जब्बार ने दावा किया कि 2-3 दिसंबर 1984 की दरम्यानी रात को यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने से रिसी जहरीली गैस मिक (मिथाइल आइसोसाइनाइट) से अब तक 20,000 से ज्‍यादा लोग मारे गए हैं और लगभग 5.74 लाख लोग प्रभावित हुए हैं।

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उन्होंने कहा कि यूनियन कार्बाइड इंडिया लिमिटेड (यूसीआईएल) उस समय यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन (यूसीसी) के नियंत्रण में था, जो अमेरिका की एक बहुराष्ट्रीय कम्पनी है और बाद में डाव केमिकल कम्पनी (यूएसए) के अधीन रहा। अगस्त 2017 से डाव केमिकल कम्पनी (यूएसए) का ई.आई डुपोंट डी नीमोर एंड कंपनी के साथ विलय हो जाने के बाद यह अब डाव-डुपोंट के अधीन है।

उन्होंने कहा कि गैस त्रासदी की जहरीली गैस से प्रभावित लोग अब भी कैंसर, ट्यूमर, सांस और फेफड़ों की समस्या जैसी बीमारियों से ग्रसित हैं। उन्होंने कहा, प्रभावितों के पास पैसा नहीं होने के कारण उन्हें उचित इलाज भी नहीं मिल पा रहा है।

इसी बीच, गैस पीड़ितों के हितों के लिए लंबे समय से काम करने वाले भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संध की रशीदा बी, भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा के नवाब खां, भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन के रचना ढींगरा एवं चिल्ड्रन अगेन्स्ट डाव कार्बाइड के नौशीन खान ने यहां एक संयुक्त बयान जारी कर आरोप लगाया कि केन्द्र एवं राज्य सरकार गैस-पीड़ितों की उपेक्षा कर रही है।

अपने संयुक्त बयान में उन्होंने कहा कि हाल के वैज्ञानिक अध्ययन यह बताते हैं कि यूनियन कार्बाइड के गैसों की वजह से भोपाल में मौतों और बीमारियों का सिलसिला जारी है, पर आज तक भोपाल गैस पीड़ितों के इलाज की निगरानी के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा गठित समिति की 80 प्रतिशत से अधिक अनुशंसाओं को अमल में नहीं लाया गया है।

कैसे हुआ यह हादसा

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1984 में 2-3 दिसंबर की वो दरमियानी रात थी। अंधेरे में शहर भोपाल के साथ-साथ यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री भी सोई पड़ी थी। तकनीकी वजहों से पिछले कई दिनों से फैक्ट्री में प्रोडक्शन ठप था लेकिन फैक्ट्री के 610 टैंक में भरी जहरीली मिथाईल आइसोसायनाइड गैस सांस ले रही थी। रात को यूनियन कार्बाइड के प्लांट नंबर ‘सी’ में टैंक नंबर 610 में जहरीली मिथाईल आइसोसायनाइड गैस के साथ पानी मिलना शुरू हुआ। गैस के साथ पानी मिलने से रासायनिक प्रक्रिया शुरू हो गई। तीन दिसंबर की अल सुबह तक टैंक में दबाव पैदा हुआ और टैंक खुल गया। टैंक खुलते ही जहरीली मिथाइल गैस रिसते हुए हवा में घुलना शुरू हो गई।

सूरज उगने से पहले ही महज कुछ घंटों के अंदर गैस हवा के झोंके के साथ आसपास के इलाके में फैलना शुरू हो गई और रात को सुकून की नींद सोए लोग मौत की नींद सोते चले गए। लोगों को मौत की नींद सुलाने में विषैली गैस को औसतन तीन मिनट लगे। सुबह होने तक जहरीली गैस अपना दायरा बढ़ाती गई और देखते ही देखते हजारों लोग मौत की भेंट चढ़ गए। सबसे बुरी तरह प्रभावित हुई कारखाने के पास वाली झुग्गी बस्ती।

भोपाल स्थित यूनियन कार्बाइड की फैक्ट्री से निकली जहरीली गैस ने सब कुछ तबाह कर दिया था। उस दिन 40 टन मिथाईल आइसोसायनाइड गैस प्लांट से लीक हुई। करीब 5.21 लाख लोग इससे प्रभावित हुए। उन 3 दिनों में भोपाल और उसके आसपास के इलाके ने तबाही का मंजर देखा। 3 हजार से ज्यादा लोगों की मौत शुरुआती दिनों के अंदर हुई। पूरे गैस कांड में करीब 23 हजार से ज्यादा लोगों ने अपनी जान गंवाई। ये आंकड़ा इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च ने जारी किया। 25 हजार से ज्यादा लोग इस गैस कांड के चलते पूरी तरह से शारीरिक तौर पर असक्षम हो गए।

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इस पूरे कांड के आरोपी वॉरेन एंडरसन को लेकर आजतक राजनीति होती है। उसका नाटकीय ढंग से भोपाल से जाना, आज भी एक रहस्य से कम नहीं। इंसानों के अलावा 2000 से ज्यादा जानवर भी इस गैस त्रासदी का शिकार बने। सरकारी रिकॉर्ड के मुताबिक, त्रासदी में 3828 लोगों की मौत और 18,922 लोग जीवन भर के लिए बीमार और 7172 लोग निशक्त हो गए थे। 1984 के 2-3 दिसंबर की दरमियानी रात को ही मौके पर तैनात फैक्ट्री के सुपरवाइजर्स को रात 11 बजे ही इस टैंक में मची खलबली का अहसास होने लगा था। लेकिन ये खलबली आगे कितनी खतरनाक होने जा रही थी किसी को इसका अहसास नहीं था। टैंक का बढ़ता तापमान सबकी पेशानी पर लकीरें खींच रहा था।

हालात पर काबू पाने की मशक्कत जारी थी लेकिन जल्द ही कर्मचारियों को अहसास हो गया कि अब हालात उनके हाथ से निकल चुके हैं। घबराए टेक्नीशियंस ने आखिरी कोशिश की और इस टैंक से जुड़ने वाली तमाम पाइप लाइंस काट दीं। अंदाजा था कि शायद इसी तरह टैंक में हो रही रिएक्शन थम जाए। लिक्विड का गैस बनना रुक जाए लेकिन ऐसा नहीं हुआ और धमाके के साथ टैंक का सेफ्टी वाल्व उड़ गया। सर्द हवा पर सवार जहरीली मिथाईल आइसोसायनाइड गैस शहर के भीतर घुस चुकी थी। इस गैस का असर नींद में दुबके हुए लोगों पर हुआ। उनका दम घुटने लगा। बेचैनी सी महसूस हुई और आंख खोलते ही मिर्ची का धुआं सा लगा, नींद उचटने के बाद जो बाहर निकले वो सीधे गैस की चपेट में थे।

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हर सेकंड के साथ एक नया आदमी गैस का शिकार हो रहा था और घंटे भर के भीतर पुराने भोपाल शहर में मौत सड़कों पर नाच रही थी। बदहवास लोग इस जहर के असर से बचने के लिए जितना भाग रहे थे, मौत उन्हें चुन-चुन कर मार रही थी। किसी को पता नहीं था कि हुआ क्या है। किसी को ये भी पता नहीं था कि मौत सिर्फ अकेले उसी का पीछा कर रही है या और भी लोग इसके शिकार हैं। जहर का पता नहीं था, इलाज कैसे होता। रात के तकरीबन डेढ़ बजे जहर ने भोपाल के मशहूर हमीदिया अस्पताल की इमरजेंसी पर दस्तक दी। घबराए लोगों के अस्पताल पहुंचने का सिलसिला शुरू हुआ। जब तक एक-दो लोग आए इमरजेंसी में मौजूद डॉक्टरों की समझ में कुछ नहीं आया।

हमीदिया अस्पताल में बीमारों की तादाद बढ़ती जा रही थी। हालात का मुकाबला करने के लिए डॉक्टरों को इमरजेंसी कॉल भेजी गई। अस्पताल में जूनियर डॉक्टरों को भी जगा कर ड्यूटी पर लगाया गया। लेकिन डॉक्टरों का सारा अमला लाचार था। उन्हें ये तो पता लग रहा था कि लाशों पर जहरीले केमिकल का असर है। बीमारों के लक्षण भी उन्हें जहर का शिकार बता रहे थे। मगर ये जहर है क्या ये जाने बगैर इलाज मुश्किल था। तब अचानक और पहली बार एक सीनियर फोरेंसिक एक्सपर्ट की जुबान पर आया मिथाइल आईसोसायनाइड का नाम। उस रात भोपाल की पूरी आबादी ने सायनाइड जहर में सांस लिया। 3 दिसंबर की सुबह सूरज चढ़ता गया।

चढ़ते सूरज के साथ भोपाल के आसमान में चीलें और गिद्ध मंडराने लगे। इनका मंडराना ही गवाही दे रहा था कि भोपाल की सड़कों पर कितनी लाशें बिछी हैं। इन लाशों में लोग तो थे ही, बड़ी तादाद में बेजुबान जानवर और मवेशी भी थे। इंसान ही इंसानी लाशों को जानवरों की तरह उठा रहे थे। गाड़ियों में भर रहे थे। गैस त्रासदी के दौरान मोती सिंह कलेक्टर और स्वराज पुरी एसपी थे। यूनियन कार्बाइड से रिसी ‘मिक’ गैस के कारण हज़ारों लोगों की मौत हो गयी थी। हादसे के बाद यूनियन कार्बाइड के तत्कालीन चीफ वॉरेन एंडरसन भोपाल आए थे।

मौके का मुआयना कर वो आनन-फानन में यहां से रवाना भी हो गया था। एंडरसन को भगाने में मदद करने का आरोप इन दोनों तत्कालीन अफसरों कलेक्टर मोती सिंह और एसपी स्वराज पुरी पर भी लगा था। इन दोनों अफसरों के ख़िलाफ आपराधिक केस दर्ज हुआ। मोती सिंह और स्वराज पुरी के ख़िलाफ भोपाल ज़िला अदालत में कंप्लेंट केस दर्ज हुआ था। उनके ख़िलाफ धारा 212, 217 और 221 के तहत परिवाद दर्ज हुआ था।

भोपाल ज़िला अदालत की कार्यवाही को जबलपुर हाईकोर्ट में चुनौती दी गयी थी। याचिका में दलील दी गयी थी कि इस मामले में 26 साल बाद संज्ञान लिया गया। जबकि कानून के मुताबिक घटना के तीन साल के भीतर कार्यवाही की जाना चाहिए थी। ये भी कहा गया कि शिकायत निराधार और सिर्फ मैगज़ीन, मीडिया और किताबों में छपी कहानी के आधार पर की गयी थी। त्रासदी के दौरान तत्कालीन कलेक्टर रहे मोती सिंह और एस पी स्वराज पुरी को जबलपुर हाईकोर्ट ने अब राहत दी है। हाईकोर्ट ने दोनों के ख़िलाफ भोपाल ज़िला अदालत में चल रहे आपराधिक मामले बंद करने का आदेश दिया है।

आरोपियों के बच निकलने की त्रासदी भी

भोपाल गैस कांड के मुख्य आरोपी वारेन एंडरसन की मौत चार साल पहले ही हो चुकी है। विश्व की इस सबसे बड़ी औद्योगिक गैस त्रासदी की एक कहानी आरोपियों के कानूनी कार्यवाही से बचने की भी है। गैस कांड के मुख्य आरोपी को तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के इशारे पर राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह ने भगाया था। अदालत में आरोपी को भगाने के षडयंत्र का कोई मुकदमा तो नहीं चला लेकिन जिन धाराओं में चार्जशीट दायर की गई वह यह बताने के लिए काफी है कि सरकार का नजरिया हजारों मौतों के बाद संवेदनशील नहीं था।

चौंतीस साल में सीबीआई को नहीं मिला कुरेशी

भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार लोगों को बचाने की कवायद 3 दिसंबर से ही शुरू हो गई थी। 2 और 3 दिसंबर की मध्य रात्रि को पुराने भोपाल के सघन इलाके छोला में स्थित यूनियन कार्बाइड के कारखाने से मिक गैस का रिसाव हुआ था। 3 दिसंबर की सुबह पुराने भोपाल और नए भोपाल की सड़कों पर जगह-जगह लाशें पड़ी हुईं थीं। पूरी दुनिया को इस रासायनिक त्रासदी ने हिला कर रखा दिया था। यूनियन कार्बाइड के चेयरमेन वारेन एंडरसन थे। वे त्रासदी के बाद भोपाल आए भी, लेकिन तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के मौखिक आदेश पर कलेक्टर मोती सिंह और पुलिस अधीक्षक स्वराज पुरी ने उन्हें सुरक्षित भोपाल से बाहर जाने दिया।

दोनों अधिकारी वारेन एंडरसन को विशेष विमान तक सरकारी वाहन से छोड़ने भी गए थे। इस पूरे मामले की जांच राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने सीबीआई से कराई थी। घटना की तीन साल तक जांच करने के बाद सीबीआई ने वारेन एंडरसन सहित यूनियन कार्बाइड के 11 अधिकारियों के खिलाफ अदालत में चार्जशीट दाखिल की थी। वारेन एंडरसन को कभी भारत नहीं लाया जा सका। उसकी अनुपस्थिति में ही पूरा केस चला। जून 2010 में इस मामले में कोर्ट ने अपना फैसला सुनाया। फैसले में कार्बाइड के अधिकारियों को जेल और जुर्माने की सजा सुनाई। अधिकारियों ने जुर्माना भरा और सेशन कोर्ट में अपील दायर कर दी।

इस पूरी घटना का अहम किरदार शकील अहमद कुरेशी था। शकील अहमद को भी कोर्ट ने दो साल की सजा सुनाई थी। शकील अहमद कौन है और कैसा दिखता है, यह आज भी रहस्य है। शकील अहमद को 34 साल बाद भी सीबीआई तलाश नहीं कर पाई है। उसकी फोटो भी सीबीआई के पास नहीं है। एक तरह से देखा जाए तो विश्व की इस भीषण गैस त्रासदी के गुनाहगारों के जेल जाने की संभावनाएं लगभग समाप्त हो चुकी हैं। वारेन एंडरसन की मौत चार साल पहले ही अमेरिका में हो चुकी है। निचली अदालत ने जिन्हें सजा सुनाई है, उन्होंने अपील कर अपने आपको जेल जाने से बचा लिया है। अपील का फैसला आठ साल में भी नहीं आ पाया है। सीबीआई ने इस मामले में गुनाहगारों की सजा बढ़ाने की अपील सेशन कोर्ट में दायर की है।

पंद्रह हजार से ज्यादा लोग मारे जाने के बाद भी सुरक्षित निकल गया एंडरसन

भोपाल में 3 दिसंबर को गैस कांड की बसरी मनाई जाती है। सेंट्रल लाइब्रेरी में सर्वधर्म सभा होती है। भोपाल के सभी सरकारी कार्यालय भी बंद रहते हैं। 34 साल से यह परंपरा चल रही है। इन चौंतीस सालों में कई गैर सरकारी संगठनों ने मुआवजे की लड़ाई अमेरिका तक में जाकर लड़ी। एंडरसन को भारत लाए जाने की मांग को लेकर भी अदालती कार्यवाही हुई। लेकिन, कोई भी सरकार एंडरसन को भारत नहीं ला सकी। सरकारी आकंड़ों के अनुसार इस घटना में पंद्रह हजार से अधिक लोग मारे गए थे। गैर सरकारी आंकड़े इससे काफी अधिक बताया जाता है। इतनी बड़ी संख्या में हुईं मौतों के जिम्मेदार लोगों को कानून कोई बड़ी सजा नहीं दे पाया। इसकी मुख्य वजह मामूली धाराओं में केस दर्ज करना रहा है।

भोपाल गैस कांड के समय कलेक्टर रहे मोती सिंह ने अपनी किताब भोपाल गैस त्रासदी का सच में उस सच को भी उजागर किया, जिसके चलते वारेन एंडरसन को भोपाल से जमानत देकर भगाया गया। मोती सिंह ने अपनी किताब में पूरे घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा कि वारेन एंडरसन को अर्जुन सिंह के आदेश पर छोड़ा गया था। वारेन एंडरसन के खिलाफ पहली एफआईआर गैर जमानती धाराओं में दर्ज की गई थी। इसके बाद भी उन्हें जमानत देकर छोड़ा गया। शकील अहमद कुरेशी के बारे में कोई नहीं जानता। कुरेशी एमआईसी प्रोडक्शन यूनिट में ऑपरेटर था। कुरेशी के सामने न आने से पूरी घटना का खुलासा नहीं हो सका है।

घटना के जिम्मेदार कार्बाइड के अधिकारी ज्यादा से ज्यादा 14 दिन ही जेल में रहे हैं। जबकि घटना से प्रभावित हजारें लोग आज भी तिलतिल कर मर रहे हैं। भोपाल गैस पीड़ित महिला औद्योगिक संगठन के अध्यक्ष अब्दुल जब्बार कहते हैं कि 34 सालों से भुगत रहे बीमारी और हानियों के एवज़ में अपने जीवनकाल में न्याय पाने की हल्की-सी उम्मीद भी नहीं दिखाई देती है। जब्बार कहते हैं, यह सच्चाई हमारी न्यायिक प्रक्रिया के बारे में बहुत कुछ कहती है, जो चुनिंदा लोगों को ही न्याय देती है। जब केंद्र और राज्यों की सरकारें ही इस मामले को गंभीरता से नहीं ले रही हैं तो वे सजा से बचे जा सकते हैं और पूरी अपराधिक न्याय प्रणाली का मजाक उड़ा सकते हैं?

आरोपियों को सजा दिलाने के बजाए मुआवजा हासिल करना रहा सरकार की प्राथमिकता

भोपाल गैस दुर्घटना के आरोपियों को सजा दिलाने के बजाए सरकार की दिलचस्पी पीड़ितों के लिए कार्बाइड कंपनी से मुआवजा वसूल करने में ज्यादा रही है। जब भी भोपाल में आरोपियों को कानून से बचाने को लेकर हल्ला मचा सरकार बचाव में मुआवजे की बात करने लगती है। वर्ष 1989 में हुए समझौते के तहत यूनियन कार्बाइड ने 705 करोड़ रुपए का मुआवजा पीड़ितों के लिए मध्यप्रदेश सरकार को दिए था। इस समझौते के लगभग 21 साल बाद केंद्र सरकार ने एक विशेष अनुमति याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर कर 7728 करोड़ रुपए के मुआवजे का दावा किया। याचिका मंजूर हो गई पर सुनवाई शुरू नहीं हुई।

यूनियन कार्बाइड एक बहुराष्ट्रीय कंपनी थी। बाद में इसका विलय डाव केमिकल कंपनी, (यू.एस.ए.) में हो गया। अगस्त 2017 से डाव केमिकल कंपनी, (यू.एस.ए.) का ई.आई डुपोंट डी नीमोर एंड कंपनी के साथ विलय हो जाने के बाद यह अब डाव-डुपोंट के अधीन है। मौजूदा हालात में मुआवजा भी बढ़ सकेगा इसकी भी संभावना कम है। आरोपियों के खिलाफ फौजदारी मुकदमा दो स्तरों पर चल रहे हैं।

पहला तीन भगोड़े आरोपियों के खिलाफ और दूसरा उन 9 आरोपियों के खिलाफ जो भोपाल के मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (सी.जे.एम.) के समक्ष हाजिर हुए थे। जून 2010 के आदेश और फैसले के तहत सी.जे.एम. ने इन 8 आरोपियों (एक अब मृत है) पर भारतीय दंड संहिता की धारा 304-ए, 336, 337 और 338 के तहत सजा सुनाई है। अदालत में चल रहे मामलों की गति काफी धीमी है। भोपाल गैस त्रासदी पीड़ित महिला उद्योग संगठन, भोपाल ग्रुप फॉर इंफॉरमेशन एंड एक्शन गैस त्रासदी प्रभावितों की कानूनी लड़ाई लगातार लड़ रहे हैं।

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