प्राकृतिक आपदाओं का कारण है स्वच्छन्द मानवीय आचरण

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Natural disasters

-डा. रवीन्द्र अरजरिया-

प्रकृति की ओर लौट चलने की बात हमेशा से ही कही जाती रही है। सकारात्मक सोच को मूर्त रूप देने के लिए समय-समय पर अभियान भी छेडे जाते रहे हैं। समाज के जागरूक करने के लिए सरकार ने बडे बजट से अभियानों को भी चलाया जिनसे कागजी आंकडों की उपलब्धिओं भरी कहानियां दस्तवेजों तक सीमित होकर रह गईं। धरातल पर परिणामों को ढूढना बेहद कठिन काम हो गया। हर साल वृक्षारोपण को जोर-शोर से चलाया जाता है। काम से अधिक प्रचार को महात्व दिया जाता है। सतही सत्य को अदृष्टिगत करने का क्रम भी निरंतर चल रहा है। सोच चल ही रही थी कि हमारी कार को ओवरटेक करके एक हरे रंग की बैन तेजी से आगे निकल गई। बैन के पीछे ट्री एम्बुलेंस लिखा था। आश्चर्य हुआ।

एम्बुलेंस तो आमतौर पर गम्भीर मरीजों को चिकित्सीय सुविधा प्रदान कर अस्पताल तक पहुंचाने वाले वाहनों पर लिखा जाता है। आखिर ट्री एम्बुलेंस लिखने के पीछे की मंशा और उस वाहन का उपयोग जानने की इच्छा बलवती हुई। ड्राइवर को गाडी तेज कर ट्री एम्बुलेंस को ओवरटेक करने का निर्देश दिया। थोडी देर में हम उससे आगे थे। इशारा देकर उसे सडक के किनारे रोकने के लिए कहा। गाडी रुकते ही हम नीचे उतरे। उस वाहन के ड्राइवर सहित पांच लोग भी गाडी से बाहर आया गये। सभी लोग नारंगी रंग की यूनीफार्म में थे जिस पर प्रकृति मित्र तथा संगम सेवालय लिखा हुआ था। आपस में अभिवादन के बाद परिचय का आदान-प्रदान किया गया। हमने उन्हें अपनी जिग्यासा से अवगत कराया।

वृक्ष में जीवन और जीवन से प्रेम की मानवीय प्रवृत्ति को उजागर करते हुए टीम में मौजूद संगम सेवालय की संस्थापक सदस्य अंजू अवस्थी ने बताया कि वात्सल्य भरे पोषण की जितनी आवश्यकता जीवधारियों को होती है उतनी ही वृक्षों को भी। जब भी हम अपनी बगिया के किसी सूख रहे पौधे को देखते थे तो मन पीडा से भर जाता था। लगता था कि परिवार का कोई सदस्य ही बीमार हो रहा है। कई बार तो ऐसा हुआ कि पौधे के मुरझा जाने पर हमारी आंखों से नींद तक छिन गई। अपनी इस मनोदशा को हमने संगम सेवालय की मासिक बैठक में रखा। सभी ने मिलकर मानवीय काया को चिकित्सीय सुविधायें पहुंचाने वाली एम्बुलेंस की तरह ही वृक्ष के स्थापित जीवन तक सुविधायें पहुंचाने का निर्णय लिया और इस तरह ट्री एम्बुलेंस की परिकल्पना ने न केवल आकार लिया बल्कि जीवन्त सहयोगियों के साथ मिलकर इसे धरातल पर भी उतारा। हमने सैद्धान्तिक विस्तार की व्याख्या को बीच में ही रोक कर इस एम्बुलेंस के साथ जुडी कार्यशैली पर प्रकाश डालने का निवेदन किया।

उन्होंने कहा कि हमारी इस टीम में तीन वैज्ञानिक हैं जिनमें प्रो. अमिता अरजरिया जो महाराजा कालेज में वनस्पति विज्ञान विभाग की प्रमुख हैं, डा. कुसुम कश्यप जो वनस्पति विज्ञान में प्राख्याता है, डा. लल्लूराम सेन जो उद्यानिकी विभाग के सेवानिवृत अधिकारी है। इनके अतिरिक्त ग्यारह वे सहयोगी हैं जो कृषि, उद्यानिकी, वनस्पति, पर्यावरण आदि विषयों में शोध कर रहे हैं। इस प्रकार हमारी इस टीम में कुछ चौदह सदस्य हैं जो निःस्वार्थ रूप से निःशुल्क कार्य करते हैं। पौधों, वृक्षों के बीमार होने की सूचना मिलने पर हमारी टीम स्थल पर जाकर पहले निरीक्षण करती है, फिर रोग के अनुसार उपचार देती है। यदि आवश्यक हुआ तो वृक्ष को स्थानान्तरित भी किया जाता है। इस हेतु वाहन में 36 उपकरणों के साथ आवश्यक दवाइयां भी उपलब्ध रहतीं हैं जिनका प्रयोग विशेषज्ञों की निगरानी में किया जाता है। सभी सहयोगी स्वयं सेवी कार्यकर्ता के रूप में जुडकर प्रकृति माता की सेवा में एक वृक्ष सौ पुत्र समान के आदर्श वाक्य को चरितार्थ कर रहे हैं।

उनकी बात समाप्त होते ही हमने कहा कि वर्तमान समय में आ रही प्राकृतिक आपदाओं को आप किस रूप में देखतीं हैं। लोगों की स्वार्थी मनोवृत्ति को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि प्राकृतिक आपदाओं का कारण है स्वच्छन्द मानवीय आचरण। प्राकृतिक संसाधनों का मनमान संदोहन, वर्चस्व हेतु परमाणु विस्फोट, विलासता हेतु वातानुकूलित संस्कृति, व्यक्तिगत स्वार्थपूर्ति हेतु उन्मुक्त आचरण और दूरगामी परिणामों की चिन्ता किये बिना वर्तमान में प्रतिष्ठा प्राप्त करने के निषेधात्मक कार्यों का संपादन जैसे अनेक कारण हैं जिनकी अति से आपदाओं का दावानल प्रगट होने के लिए बाध्य हो रहा है। चर्चा चल ही रही थी कि तभी हमारे फोन की घंटी बजी। फोन उठाने पर याद आया कि हमें पूर्व निर्धारित समय पर किसी आवश्यक कार्य हेतु पहुंचना था। सो इस विषय पर फिर कभी विस्तार से चर्चा का आश्वासन लेकर हमने उनसे विदा मांगी। इस बार बस इतना ही। अगले सप्ताह एक नये मुद्दे के साथ आपसे फिर मुलाकात होगी। तब तक के लिए खुदा हाफिज।

 

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