रेल पटरियों पर बढ़ता बोझ

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-योगेश कुमार गोयल-

जोगबनी (बिहार) से आनंद विहार (दिल्ली) जा रही सीमांचल एक्सप्रेस की दुर्घटना प्रमुख कारण पटरी टूटी होना बताया गया है। हादसा कितना भयावह था, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि डिब्बों के पटरी से उतरते ही एक के बाद एक वे एक-दूसरे के ऊपर चढ़ते चले गए। सीमांचल एक्सप्रेस की दुर्घटना से करीब डेढ़ दिन पहले एक फरवरी को जयपुर के सांगानेर रेलवे स्टेशन पर भी दोपहर के समय जबलपुर से अजमेर जा रही दयोदय एक्सप्रेस के डिब्बे पटरी से उतर गए थे।

ट्रेन सांगानेर स्टेशन से कुछ दूर ही चली थी और हादसे के समय ट्रेन की रफ्तार काफी कम थी, इसलिए उस वक्त कोई बड़ा हादसा टल गया। जब भी कोई दिल दहलाने वाला रेल हादसा होता है तो भविष्य में ऐसे हादसों की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कड़े कदम उठाने का रटा-रटाया जवाब सुनाई देने लगता है लेकिन चंद दिनों बाद जब फिर कोई बड़ा रेल हादसा सामने आता है। ऐसे रेल हादसों के बाद प्रायः जांच के नाम पर कुछ रेल कर्मचारियों व अधिकारियों पर गाज गिरती है किन्तु समूचा रेल तंत्र उसी पुराने ढ़र्रे पर रेंगता रहता है।

हादसे के कारणों को लेकर तरह-तरह की बातें कही-सुनी जाती हैं। कभी रेलकर्मियों की लापरवाही की बात सामने आती है तो कभी कहा जाता है कि बाहरी ताकतों ने इसे अंजाम दिया। हर दुर्घटना के बाद जाँच के आदेश दिए जाते हैं और जांच के लिए उच्च स्तरीय समिति गठित की जाती है किन्तु समिति की रिपोर्ट फाइलों में दबकर रह जाती है। यही कारण है कि किसी भी हादसे में कभी पता तक नहीं चलता कि उस हादसे में दोषी कौन था? हमें यह समझ लेना होगा कि चंद अफसरों या कर्मियों पर कार्रवाई से हालात बदलने वाले नहीं है बल्कि रेल मंत्रालय को उन मूल कारणों का उपचार करना होगा, जिनकी वजह से इस तरह के हादसे सामने आते रहते हैं। रेल दुर्घटनाओं के मामले में भारतीय रेलों की क्या दशा है, इसका अनुमान रेल मंत्रालय के ही इन आंकड़ों से लगाया जा सकता है कि पिछले साढ़े चार वर्षों में 350 से भी अधिक छोटे-बड़े हादसे हो चुके हैं।

2017 की एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार 2014-15 में जहां 135 रेल हादसे हुए, वहीं 2015-16 में 107 और 2016-17 में 104 रेल हादसे सामने आए। तत्कालीन रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने संसद में बताया था कि 2012 से 2017 के बीच पांच वर्षों में देश में 586 रेल हादसे हुए, जिनमें 308 बार ट्रेनें पटरी से उतरीं और उन हादसों में 1011 लोग मारे गए। पटरी से उतरने वाली ट्रेनों ने ही 347 जानें ले ली। उन्होंने रेलवे सेफ्टी और यात्री सुरक्षा से जुड़े एक सवाल के जवाब में बताया था कि पिछले तीन वर्ष में हुए रेल हादसों की बड़ी वजह रेलवे स्टाफ की नाकामी, सड़क पर चलने वाली गाडि़यां, मशीनों की खराबी और तोड़-फोड़ रही। उन्होंने संसद में बताया था कि 2014-15 के 135 रेल हादसों में 60, 2015-16 में हुए 107 हादसों में 55 और 2016-17 में 30 नवम्बर 2016 तक के 85 हादसों में से 56 दुर्घटनाएं रेलवे स्टाफ की नाकामी या लापरवाही के चलते हुई। तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु द्वारा 2016-17 के रेल बजट में रेल दुर्घटनाएं रोकने के लिए ‘मिशन जीरो एक्सीडेंट’ नामक एक विशेष अभियान शुरू करने की घोषणा की गई थी। उसके बाद रेल दुर्घटनाओं पर अंकुश लगाने के लिए त्वरित पटरी नवीनीकरण, अल्ट्रासोनिक रेल पहचान प्रणाली तथा प्राथमिकता के आधार पर मानवरहित रेलवे क्रॉसिंग खत्म किए जाने जैसे विभिन्न सुरक्षा उपायों पर कार्य किया जा रहा है। हालांकि अभी तीव्र गति से बहुत कुछ किया जाना बाकी है। 2016-17 के दौरान 1503 मानव रहित समपार क्रॉसिंग को खत्म किया गया जबकि 484 मानव युक्त समपार फाटकों को उपरिगामी सेतु या भूमिगत सेतु बनाकर खत्म किया गया। अब दावा है कि कोई भी क्रॉसिंग मानव रहित नहीं है। इसके बावजूद रेल हादसों पर लगाम नहीं लग रही है तो इसके कारणों पर चर्चा करना बेहद जरूरी है। सवाल यह है कि रेल मंत्रालय वाकई रेलों की दशा और दिशा सुधारने के लिए कृतसंकल्प है और इस दिशा में गंभीर प्रयास किए भी जा रहे हैं तो रेल दुर्घटनाएं क्यों नहीं रुक रही हैं? रेल दुर्घटनाओं पर लगाम न लग पाने का एक बड़ा कारण है रेल पटरियों की जर्जर हालत, जिन पर सरपट दौड़ती रेलें कब किस जगह बड़े हादसे का शिकार हो जाएं, कहना मुश्किल है। एक तरफ जहां बूढ़ी हो चुकी जर्जर पटरियों पर जवान ट्रेनें सरपट दौड़ रही हैं, वहीं देशभर में लगभग सभी स्थानों पर पटरियां अपनी क्षमता से कई गुना ज्यादा बोझ ढो रही हैं। रेलवे ट्रैकों पर बोझ लगातार बढ़ रहा है। भारतीय रेलवे के कुल 1219 रेलखंडों में से करीब 40 फीसदी पर ट्रेनों का जरूरत से ज्यादा बोझ है।

एक रिपोर्ट के मुताबकि 247 रेलखंडों में से करीब 65 फीसदी तो अपनी क्षमता से 100 फीसदी से भी अधिक बोझ ढोने को मजबूर हैं और कुछ रेलखंडों में पटरियों की कुल क्षमता से 220 फीसदी तक ज्यादा ट्रेनों को चलाया जा रहा है। इस वजह से भी अनेक वीभत्स हादसे होने के बाद भी रेल तंत्र इस ओर से आंखें मूंदे रहा है। भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े रंल तंत्रों में से एक है। भारतीय रेलों में प्रतिदिन सवा करोड़ से ज्यादा लोग सफर करते हैं। रेलों में बढ़ते यात्रियों के बोझ के बावजूद रेल पटरियों को उतना नहीं बढ़ाया गया, जितनी उन पर बढ़ते बोझ के अनुरूप आवश्यकता थी। रेलवे की स्थायी समिति द्वारा अपनी सुरक्षा रिपोर्ट में स्पष्ट किया जा चुका है कि वर्ष 1950 से 2016 के बीच दैनिक रेल यात्रियों में जहां 1344 फीसदी की वृद्धि हुई है, वहीं माल ढुलाई में 1642 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसके विपरीत रेलवे ट्रैक का विस्तार महज 23 फीसदी ही हो सका है। वर्ष 2000 से 2016 के बीच दैनिक यात्री ट्रेनों की संख्या में भी करीब 23 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। स्पष्ट है कि रेल पटरियों पर बीते दशकों में कितने गुना बोझ बढ़ा है। यात्री रेलों के अलावा मालगाडि़यों की भी बात करें तो अधिकांश मालगाडि़यां भी ट्रैकों पर उनकी क्षमता से कहीं अधिक भार लिए दौड़ रही हैं। रेल नियमावली के अनुमार मौजूदा ट्रैक पर 4800 से 5000 टन भार की मालगाडि़यां ही चलाई जा सकती हैं लेकिन पिछले कई वर्षों से सभी ट्रैकों पर 5200 से 5500 टन भार के साथ मालगाडि़यां दौड़ रही हैं। कैग की एक रिपोर्ट में ओवरलोडेड मालगाडि़यों के परिचालन पर आपत्ति जताते हुए उन पर प्रतिबंध लगाने का सुझाव दिया था किन्तु कमाई के फेर में रेलवे द्वारा कैग के इन महत्वपूर्ण सुझावों को रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया।

रेल पटरियों पर जब भी कोई बड़ा हादसा होता है तो सवाल रेल तंत्र पर ही उठते हैं किन्तु इस बात की चर्चा नहीं होती कि आम लोग भी स्वयं कितने लापरवाह हैं। वे खुद जान जोखिम में डालकर बेधड़क रेल पटरियां पार करते हैं। कई स्थानों पर फुटओवर ब्रिज होने के बावजूद लोग पटरियां पार कर दूसरी ओर जाते हैं। कुछ वर्ष पूर्व काकोदकर समिति की रिपोर्ट में खुलासा हुआ था कि हमारे देश में हर साल 15 हजार से भी अधिक व्यक्ति पटरियां पार करते हुए रेलों से कटकर मर जाते हैं। संसद में दिए एक जवाब से यह खुलासा भी हुआ था कि 2009 से 2011 के बीच रेल पटरियों पर कुल 41474 लोग मारे गए थे। चिंता की बात यह है कि देशभर में तमाम रेल दुर्घटनाओं में भी इतनी मौत नहीं होती, जितनी पटरियां पार करते समय रेलों से कटकर होती हैं। बेहतर होगा, रेल तंत्र पटरियों पर दौड़ती मौत रूपी भारतीय रेल के सफर को सुरक्षित बनाने की दिशा में शीघ्रातिशीघ्र कारगर कदम उठाए और हर रेल में यात्रियों की सुरक्षा के भी पुख्ता इंतजाम हों।

(लेखक स्तंभकार हैं)

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