हकीकत के आईने में गौवंश संरक्षण

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-निर्मल रानी-

नववर्ष की सर्वप्रथम कैबिनेट बैठक में उत्तर प्रदेश के मु यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कई महत्वपूर्ण फैसलों को अपनी मंज़ूरी प्रदान की। इन फैसलों में एक महत्वपूर्ण फैसला गौवंश संरक्षण से भी संबंधित था। कहना गलत नहीं होगा कि देश के किसी भी राज्य द्वारा अब तक गौवंश संरक्षण हेतु इतने बड़े पैमाने पर कोई फैसला नहीं लिया गया है। इस निर्णय के अंतर्गत् उत्तर प्रदेश के समस्त निकायों, गांवों, क्षेत्र, जि़ला पंचायत, नगरपालिका, नगर पंचायत तथा नगर निगमों में अस्थायी गौशालाएं खोली जाएंगी। योगी सरकार द्वारा यह कदम लगभग पूरे प्रदेश से आवारा पशुओं के संबंध में आने वाली परेशानियों के समाचारों के मद्देनज़र उठाया गया है। यह निर्णय धरातल पर कितना कारगर साबित होता है यह तो आने वाला समय ही बताएगा परंतु इतना तो ज़रूर है कि सरकार के इस फैसले से यह स्पष्ट हो गया है कि योगी सरकार गौहत्या के सख्त खिलाफ है तथा आवारा पशुओं के सड़कों व खेतों में खुलेआम घूमने से होने वाले नुकसान के प्रति भी चिंतित है। इस संबंध में लिए गए निर्णय के अनुसार प्रदेश के आवारा पशुओं का नियमन किया जाएगा। ग्राम पंचायत स्तर पर सरकारी ज़मीन उपलब्ध कराई जाएगी तथा इनमें गौ संरक्षण सदन बनाए जाने का प्रस्ताव है। इस योजना में मनरेगा के माध्यम से ग्राम पंचायत स्तर पर निर्माण कराया जाएगा। यह निर्माण विधायक व सांसद निधि कोष से होगा। प्रत्येक स्थानीय निकाय को सरकार द्वारा इस कार्य के लिए सौ करोड़ रुपये दिए गए है। प्रत्येक जि़ले में कम से कम एक हज़ार आवारा पशुओं के लिए इस प्रकार के आश्रय स्थलों का निर्माण कराया जाएगा।

परंतु इसी तस्वीर का दूसरा रुख यह भी है कि गौवंश संरक्षण हेतु किए जाने वाले इन उपायों पर आने वाले खर्च को पूरा करने के लिए उत्तर प्रदेश सरकार ने गौ कल्याण उपकर लगाने का भी निर्णय लिया है। इसके अंतर्गत् 0.5 प्रतिशत गौ कल्याण उपकर उत्पाद कर के दायरे में आने वाली सभी वस्तुओं पर लगेगा। शराब पर यह टैक्स नहीं लगाया जाएगा। टोल टैक्स, मंडी परिषद् तथा विभिन्न सरकारी एजेंसियों द्वारा भी इस टैक्स का भुगतान किया जाएगा। गोया कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि योगी सरकार आम जनता से ही इन निराश्रित पशुओं के संरक्षण पर आने वाले खर्च की भरपाई करेगी। इतना ही नहीं बल्कि सांसद तथा विधायक निधि कोष का जो पैसा जनकल्याण में खर्च होना चाहिए था वह भी अब गौवंश संरक्षण पर खर्च किया जाएगा। इन उपायों से कम से कम एक बात तो बिल्कुल ही स्पष्ट हो गई है कि सरकार द्वारा जनकल्याण तथा क्षेत्रीय विकास से कहीं अधिक गौवंश संरक्षण की ज़रूरत महसूस की जा रही है। इस योजना पर कुल मिलाकर हज़ारों करोड़ रुपये केवल उत्तर प्रदेश सरकार को ही खर्च करने पड़ेंगे। ज़रा सोचिए यदि इसी प्रकार की नीतियां देश के अन्य राज्यों में भी लागू की गईं तो देश का कितना धन गौ संरक्षण के नाम पर खर्च किया जाएगा?

इस संबंध में एक बात और भी विचारणीय है कि क्या देश में पहले से बनी हज़ारों बड़ी व छोटी गौशालाएं जिन्हें सरकार गौ संरक्षण हेतु धन भी मुहैया कराती है, क्या वे अपनी गौशालाओं की सभी गायों का समान रूप से पालन-पोषण कर रही हैं? क्या बीमार पशुओं का समुचित इलाज हो पाता है? क्या गौवंश के नाम पर इकट्ठा किए जाने वाला सरकारी व गैर सरकारी सहायता कोष अथवा दान इन बेज़ुबान पशुओं पर पूरी ईमानदार से खर्च किया जाता है? क्या वजह है कि देश की सैकड़ों गौशालाओं से संबंधित अनेक नकारात्मक समाचार प्राय: प्राप्त होते रहे हैं। चोरी-छुपे बीमार व कमज़ोर गायों पर गौशाला संचालकों द्वारा ध्यान न दिए जाने तथा इस कारण मरने वाली गायों को गौशालाओं से दूर फेंके जाने की भी अनेक घटनाएं सामने आ चुकी हैं। आमतौर पर तो यही देखा जाता हे कि गौ संरक्षण गृहों में दान-पुण्य पर पलने वाले गौवंश को वहां रहने का उतना लाभ नहीं मिलता जितना कि गौशाला संचालकों को इन गौवंश की सेवा के नाम पर प्राप्त होता है।

उधर जब से गौरक्षा के नाम पर गाय का व्यापार करने वाले कई लोगों के साथ हिंसक वारदातों का सिलसिला शुरु हुआ तब से भयवश गायों का इधर से उधर आना-जाना तथा व्यापार आदि ठप्प हो गया है। बड़े पैमाने पर मांस निर्यात करने वाले बूचडख़ानों में होने वाली पशुओं की आपूर्ति को छोड़कर एक-दो पशु ले जाने वालों पर ज़्यादा निगाह रखी जाती है। वजह बिल्कुल साफ है कि मांस निर्यातकों की सत्ता के गलियारों में सीधी घुसपैठ है। दूसरी ओर यही पशु चाहे किसानों की फसल बरबाद करें, सड़कों पर दुर्घटनाओं का कारण बनें, गलियों व रास्तों में लोगों को सींग मारते फिरें या रास्ते में बैठकर आवागमन को बाधित करें परंतु जनता की इन परेशानियों को सुनने वाला कोई भी नहीं है। पहले ही भारतीय किसान नील गाय व बंदरों के आतंक से अपनी फसल से पूरी पैदावार हासिल नहीं कर पा रहा। देश के कई राज्यों में विशेषकर नदियों के किनारे के क्षेत्रों में नील गायों के झुंडों का आतंक इतना फैल गया है कि हज़ारों किसान खेती-बाड़ी का काम ही छोड़ चुके हैं। हिमाचल प्रदेश में भी बंदरों के चलते तमाम किसानों ने खेती व बागवानी के काम छोड़ दिए हैं।

परंतु आज तक देश की किसी भी सरकार ने किसानों को इन निराश्रित पशुओं से बचाने के विषय में कभी नहीं सोचा। न ही इस संबंध में कोई योजना बनाई गई। परंतु उत्तर प्रदेश सरकार निराश्रित गौवंश संरक्षण के लिए हज़ारों करोड़ रुपये खर्च करने यहां तक कि इसके लिए जनता से नए कर वसूलने की भी तैयारी कर चुकी है। देश में कई जगहों से ऐसे समाचार भी मिले हैं कि गांव के लोगों द्वारा ऐसे आवारा पशुओं से तंग आकर उन्हें किसी स्कूल अथवा सरकारी भवन की चाहरदीवारी में बंद कर दिया गया। ज़ाहिर है इन पशुओं से दु:खी किसान या इनके भय से ग्रस्त आम आदमी मूक दर्शक बनकर जहां स्वयं को असहाय महससू कर रहा है वहीं गौ संरक्षण हेतु बनाई जाने वाली महत्वपूर्ण योजनाओं को भी बड़े गौर से देख रहा है। निश्चित रूप से देश के किसानों को यह जानने का पूरा हक है कि जो सरकार निराश्रित पशुओं के संरक्षण के लिए इतने पैसे खर्च करने जा रही है यहां तक कि जनता पर उपकर लगाने को भी तैयार है वही सरकार क्या किसानों को आत्महत्या करने से नहीं रोक सकती? क्या मानव जाति के सदस्य, किसानों को संरक्षण का कोई अधिकार नहीं है?

दरअसल गौवंश का विषय अब लगभग पूरी तरह से आम लोगों की भावनाओं से जोड़ दिया गया है जबकि इस विषय पर गहन शोध भी नहीं किया गया। आज देश में हल बैल व बैल गाडिय़ों की ज़रूरत लगभग खत्म सी हो गई है। इन्हीं ज़रूरतों को पूरा करने में बैलों का प्रयोग हुआ करता था। परंतु बछड़े की पैदावार तो प्राकृतिक रूप से उसी अनुपात में होती आ रही है जैसी पहले हुआ करती थी। ऐसे में जब एक गौपालक अपनी कम दूध देने वाली गाय को चारा खिलाने से कतराता है और उसे बेचकर दूसरी अधिक दूध देने वाली गाय लाना उचित समझता है फिर आिखर उस गौ पालक से यह उ मीद कैसे की जा सकती है कि वह एक ऐसे बछड़े की परवरिश करे जिससे भविष्य में न तो कोई लाभ है न ही उसका कोई उपयोग? ऐसे में उस गौ पालक के समक्ष इसके सिवा कोई दूसरा रास्ता ही नहीं कि वह उस बछड़े को अपने घर से बाहर धकेल दे और वह बछड़ा अनाश्रित होकर सड़कों पर आवारा फिरता रहे और राहगीरों या किसानों के लिए समस्या का कारण बने। गौ संरक्षण निश्चित रूप से होना चाहिए परंतु इसके लिए दूरगामी व दीर्घकालीन नीति भी बनाई जानी चाहिए। गौवंश संरक्षण को केवल भावनात्मक या चुनावी अथवा इसकी आड़ में धन कमाने का ज़रिया कतई नहीं बनाना चाहिए।

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