छाती ठोक कर हिंदुत्व का समर्थन करने वाला एक राजनेता बाल ठाकरे

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महाराष्ट्र की राजनीति में ‘गॉडफादर’ माने जाने वाले बाल ठाकरे की पुण्यतिथि पर विशेष

ठीक पांच साल पहले, आज ही के दिन 17 नवम्बर (2012) को शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब केशव ठाकरे (बाल ठाकरे) ने इस दुनिया को अलविदा कहा था। शिवाजी पार्क में उनकी जीवन की अंतिम यात्रा के दौरान पूरा मुंबई सन्न था। पांच लाख से ज़्यादा लोग सड़कों पर थे। माहौल बेहद ग़मगीन था।

लगभग 46 साल तक सार्वजनिक जीवन में रहे शिवसेना प्रमुख बाल ठाकरे ने कभी न तो कोई चुनाव लड़ा और न ही कोई राजनीतिक पद स्वीकार किया। यहां तक कि उन्हें विधिवत रूप से कभी शिवसेना का अध्यक्ष भी नहीं चुना गया था। लेकिन इन सब के बावजूद महाराष्ट्र की राजनीति और ख़ासकर इसकी राजधानी मुंबई में उनका ख़ासा प्रभाव था। किसी के लिए नायक तो किसी के लिए खलनायक रहे बाल ठाकरे जब तक जिंदा रहे, अपनी शर्तों पर जीते रहे।

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एक पत्रकार और कार्टूनिस्ट के रूप में करियर की शुरुआत करने वाले बाल ठाकरे के लिए नियति ने कुछ और ही तय कर रखा था। 23 जनवरी 1926 को केशव सीताराम ठाकरे के घर जन्मे बाल ठाकरे ने ‘द फ्री प्रेस जर्नल’ में एक कार्टूनिस्ट के रूप में अपने करियर की शुरुआत की। रविवार को उनके कार्टून टाइम्स ऑफ इंडिया में भी प्रकाशित होते थे। साल 1960 में महाराष्ट्र में गुजराती और दक्षिण भारतीय लोगों की तादाद बढ़ने का विरोध करने के लिए बाल ठाकरे ने अपने भाई के साथ मिलकर साप्ताहिक पत्रिका मार्मिक की शुरुआत की।

बताया जाता है कि बाल ठाकरे के राजनीतिक विचार अपने पिता से ही प्रेरित रहे हैं, जो युनाइटेड महाराष्ट्र मूवमेंट के एक बड़े नेता थे। इस मूवमेंट के जरिए भाषाई तौर पर अलग महाराष्ट्र राज्य बनाने की मांग हो रही थी। बाल ठाकरे की जिंदगी में विवादों के लिए हमेशा एक खास कोना सुरक्षित रहा। सही मायनों में देखा जाए तो उनकी इमेज एक कट्टर हिंदू नेता के तौर पर रही और शायद इसी वजह से उन्हें हिंदू सम्राट का तमगा भी दिया गया।

शिवसेना का गठन और राजनीति में प्रवेश

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‘मार्मिक’ के जरिए बाल ठाकरे ने मुंबई में गुजरातियों, मारवाड़ियों और दक्षिण भारतीय लोगों के बढ़ते प्रभाव के खिलाफ मुहिम चलाई। इसी क्रम में साल 1966 में बाल ठाकरे ने शिवसेना का गठन किया, जिसका लक्ष्य मराठियों के हितों की रक्षा करना और उन्हें नौकरियों, आवास की सुविधा उपलब्ध करवाना था। साल 1989 से शिवसेना और बाल ठाकरे के विचारों को जनता तक पहुंचाने के लिए समाचार पत्र ‘सामना’ को भी प्रकाशित किया जाने लगा। सामना में बाल ठाकरे ने आखिरी समय दीपावली तक लिखना जारी रखा।

1966 में लगे दो-दो झटके, पर नहीं मानी हार

यह वह दौर था जब बाल ठाकरे को एक साथ दो-दो झटके लगे। 1996 में पत्नी मीना ठाकरे और बेटे बिंदुमाधव की मौत हो गई। लेकिन ठाकरे ने हार नहीं मानती और मजबूती से खड़े रहे। राजनीति में उनका कद बढ़ता गया। इस बीच भारतीय राजनीति की दक्षिणपंथी धुरी बीजेपी और शिवसेना स्वाभाविक दोस्त बनकर उभरीं। अचरज की बात नहीं है कि शिवसेना बीजेपी की सबसे पहली सहयोगी पार्टी बनी।

धीरे धीरे बढ़ी ताकत

बाल ठाकरे के जीवन से जुड़ी कई कल्पित कहानियां प्रचलित होने लगीं। कहा गया कि वो जर्मनी के पूर्व तानाशाह हिटलर के प्रशंसक हैं। एक पत्रिका में उनके हवाले से ये ख़बर दी गई थी लेकिन उन्होंने न तो इसकी पुष्टि की और न ही इसका खंडन किया।

धीरे-धीरे मुंबई म्यूनिसिपल कॉरपोरेशन के चुनाव में उनकी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर होने लगा लेकिन अभी भी पार्टी को बड़ी राजनीतिक कामयाबी नहीं मिल पा रही थी। शिवसेना का प्रभाव मुंबई और इसके आस-पास के इलाक़ों तक ही सीमित है और राज्य के दूसरे इलाक़ों में पार्टी का कुछ ख़ास असर नहीं है। बाल ठाकरे 80 और 90 के दशक में तेजी से उभरे क्योंकि उस समय हिंदुत्व का मुद्दा सिर चढ़ कर बोल रहा था और ठाकरे कट्टर हिंदुत्व के समर्थक थे।

हिंदुत्व का दामन

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि शुरूआती दौर में सत्ताधारी कांग्रेस ने शिवसेना को या तो नज़रअंदाज़ किया या फिर कई मामलों में तो वामपंथियों जैसे अपने राजनीतिक विरोधियों को समाप्त करने के लिए शिवसेना को प्रोत्साहित किया।
लेकिन 80 के दशक के दौरान शिवसेना एक बड़ी राजनीतिक शक्ति बन गई थी जो राज्य में सत्ता हासिल करने के लिए अपनी दावेदारी पेश कर रही थी। इस दौरान बाल ठाकरे ने दक्षिणपंथी वोटरों को लुभाने के लिए हिंदुत्व का दामन थाम लिया।
1992 में उत्तर प्रदेश के अयोध्या में बाबरी मस्जिद के तोड़े जाने के बाद मुंबई में हिंदु और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हुए जो कई हफ़्तों तक चले। इन दंगों में शिवसेना और बाल ठाकरे का नाम बार-बार लिया गया। दंगों में कुल 900 लोग मारे गए थे। सैंकड़ों लोगों ने दंगों के बाद मुंबई छोड़ दी और फिर कभी लौट कर नहीं आए।

अयोध्या विवाद

वर्ष 1992 में जब अयोध्या का विवादित ढांचा गिराया गया था तब भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने तो खुलकर जिम्मेदारी नहीं ली। सभी लोगों ने यहां तक कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवकों का इससे कोई लेना देना नहीं है।

लेकिन बाल ठाकरे से जब यही सवाल दोहराया गया तो उन्होंने कहा, “हमारे लोगों ने ये गिराया है और मुझे उसका अभिमान है।” उन्होंने एक समय यहां तक कह दिया था, “हिंदू अब मार नहीं खाएंगे, उनको हम अपनी भाषा में जवाब देंगे।”

उन्हें पता था कि इस तरह की भाषा से उन्हें लोगों का समर्थन मिल सकता है और अनेक टीकाकार मानते हैं कि इसी भाषा ने उनके राजनीतिक भविष्य को स्थापित करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई। यही वजह थी कि लोगों के बीच उनके बारे में दिलचस्पी बढ़ने लगी।

सत्ता की चाबी

उन्होंने कट्टर हिंदुत्व और पाकिस्तान के प्रति जो कट्टरवादी रवैया अपनाया उससे भी समाज के कुछ वर्गों में उन्हें समर्थन मिला। उन्होंने मुसलमानों के विरोध में वकत्व्य दिए। कट्टर हिंदुत्व की बात की। भारत-पाक क्रिकेट पर भी कड़ा रुख अपनाया।

सिर्फ़ तीन साल के बाद शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी मिलकर राज्य में अपनी सरकार बनाने में सफल हो गए। बाल ठाकरे ने अपने एक बहुत ही क़रीबी नेता को मुख्यमंत्री बनाया और सत्ता की चाबी ख़ुद अपने पास रखी।

पिछले एक दशक में शिवसेना का अभियान उत्तर भारत से मुंबई आए आप्रवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ हो गया।

अच्छे वक्ता

ठाकरे एक अच्छे वक्ता थे और लोगों को अपनी मज़ेदार बातों से ख़ूब आकर्षित करते थे। मुंबई के शिवाजी पार्क में दशहरा के अवसर हर साल होने वाले उनके भाषण का उनके समर्थकों को ख़ूब इंतज़ार रहता था।

ज़िंदगी के आख़िरी बरस वो ख़राब स्वास्थ के कारण शिवाजी पार्क तो नहीं जा सके लेकिन अपने समर्थकों के लिए उन्होंने वीडियो रिकॉर्डेड संदेश भेजा जिसमें उन्होंने अपने चाहने वालों से अपील की थी कि वे उनके पुत्र और शिवसेना के कार्यकारी अध्यक्ष उद्धव ठाकरे को उतना ही प्यार और सम्मान दें जितना उन्होंने बाल ठाकरे को दिया था।

एक कार्टूनिस्ट के तौर पर बाल ठाकरे ब्रितानी कार्टूनिस्ट डेविड लो को बहुत पसंद करते थे। दूसरे विश्व युद्ध पर डेविड लो के कार्टून बहुत लोकप्रिय हुए थे। मृत्यु से कुछ समय पहले तक ठाकरे अपनी मराठी साप्ताहिक मार्मिक के लिए ख़ुद कार्टून बनाते थे।

राज ठाकरे के अलग होने से हुई क्षति

Uddhav Thackeray

बता दें कि शुरू में बाल ठाकरे की सियासी विरासत के वारिस लंबे समय तक उनके भतीजे राज ठाकरे माने जाते रहे। कथित तौर पर बाल ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे द्वारा दरकिनार किए जाने पर 9 मार्च 2006 को राज ठाकरे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एमएनएस)नाम से अलग पार्टी बना ली। निजी और राजनीतिक रूप से बाल ठाकरे के लिए यह बहुत बड़ क्षति थी।

ठाकरे और विवाद चलते रहे साथ-साथ

बाहरी दुनिया के लिए कट्टर आदर्शवादी राजनेता बाल ठाकरे कम्पलीट फैमिली मैन भी थे। राजनीति बालासाहेब ने भले ही भाषाई और क्षेत्रीयता के आधार पर की लेकिन उनकी शख्सियत ऐसी थी कि साउथ के भी राजनेता से लेकर अभिनेता तक उनसे मिलने को आतुर रहते थे। बाल ठाकरे और विवाद हमेशा साथ-साथ चलते रहे। बतौर आर्टिस्ट और जनसमुदाय के नेता के तौर पर हिटलर की तारीफ कर उन्होंने जबर्दस्त विवाद पैदा किया था। इसके अलावा लिट्टे का समर्थन, वैलंटाइन्स डे जैसी चीजों का जबर्दस्त विरोध उनके विवादों की लिस्ट बढ़ाती रहीं।

कांग्रेस से विरोध के बावजूद इन्हें समर्थन

बाल ठाकरे की शख्सियत केवल राजनीति के रूप में ही नहीं बल्कि उनकी पहचान कला के क्षेत्र में भी जबर्दस्त थी। बाल ठाकरे की दुर्गा पूजा की रैली मुंबई की सबसे चर्चित रैलियों में से एक रही। बता दें कि बाल ठाकरे की कांग्रेस से कभी नहीं बनी। इसके बावजूद उन्होंने 2012 के राष्ट्रपति चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार प्रणव मुखर्जी का समर्थन किया था। इसके पहले भी उन्होंने प्रतिभा पाटिल का महाराष्ट्र से होने के नाम पर समर्थन किया था।

1 टिप्पणी

  1. बालासाहेब ठाकरे, महाराष्ट्र ही नहीं भारतवर्ष की राजनीति में एक बेहद शक्तिशाली हस्ताक्षर रहे। उनके जीवनकाल में किसी भी राजनैतिक दल के द्वरा महाराष्ट्र में शिवसेना की शक्ति को दरकिनार करना या कमतर आंकने की हिम्मत नहीं थी। आज दुर्भाग्य से उद्धव ठाकरे के कमजोर नेतृत्व और राज ठाकरे के अलग होना, दो घटनाओं ने शिव सैनिकों के मनोबल को बहुत बुरी तरह से तोड़ा है। यदि ऐसा ही चलता रहा तो देश की राजनीति में शिवसेना को इतिहास बनने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा।

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