मान न मान, मैं तेरा मेहमान?

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Nirmal-Rani

-निर्मल रानी-

राजधानी दिल्ली में यमुना नदी पर बनाए गए बहुप्रतीक्षित ‘सिग्नेचर ब्रिज’ का उद्घाटन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल द्वारा गत् 4 नवंबर को किया गया। इस विचित्र पुल के मुख्य स्तंभ की ऊंचाई 154 मीटर है जो भारत में इस प्रकार के बने पुलों में सबसे अधिक ऊंचा है। संयोग से इस पुल के उद्घटन से मात्र चार दिन पूर्व ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुजरात के नर्मदा जि़ले में भारत के पूर्व गृहमंत्री सरदार वल्लभ भाई पटेल की विश्व की सबसे ऊंची 182 मीटर की प्रतिमा को जनता को समर्पित किया।

यहां यह बताने की ज़रूरत नहीं कि इन दोनों योजनाओं में कोैन सी योजना जनहितकारी है और किस योजना के माध्यम से केवल धन की बरबादी की गई है। बहरहाल, इन प्रश्रों से अलग हटकर एक दूसरा प्रश्र यह है कि जहां सरदार पटेल की प्रतिमा का उद्घाटन पूरी शांति व सद्भाव के साथ संपन्न हुआ वहीं क्या वजह थी कि दिल्ली सरकार द्वारा निर्मित किए गए उद्घाटन समारोह में हंगामा,अशांति फैलाने तथा अराजकता जैसा वातावरण बनाने की कोशिश की गई?आख़िर इस प्रकार के वीडियो व समाचार क्यों।

प्रकाशित व प्रसारित हुए जिसमें यह देखा गया कि दिल्ली के स्थानीय सांसद एवं दिल्ली प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष मनोज तिवारी पुलिस अधिकारियों के साथ धक्कामुक्की कर रहे हैं,पुलिस के आला अधिकारियों को धमका रहे हैं यहां तक कि पुलिस अधिकारी पर हाथ उठाते हुए भी उनकी वीडियो वायरल हुई है। यदि आम आदमी पार्टी के नेताओं की मानें तो उनका सीधा आरोप है कि मनोज तिवारी ने ग़ैर आमंत्रित तरीक़े से ज़बरदस्ती स्टेज पर पहुंचने की तथा सरकारी कार्यक्रम में बाधा पहुंचाने की कोशिश की। आप की एक नेता ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि तिवारी दंगे की स्थिति पैदा करने के लिए समारोह स्थल पर गए थे। इस बिन बुलाए मेहमान के साथ आप पार्टी के एक विधायक की गाली-गलौच व धक्कामुक्की की ख़बरें भी हैं।

सवाल यह है कि देश के विकास तथा जन समस्याओं से सीधे तौर पर जुड़े हुए इस पूरे कार्यक्रम में किसी विशिष्ट व्यक्ति की एक अनामंत्रित अतिथि के रूप में जाने की ज़रूरत ही क्या थी? परंतु इसी सवाल के साथ दूसरा सवाल यह भी है कि एक स्थानीय सांसद होने के नाते आख़िर दिल्ली सरकार द्वारा मनोज तिवारी को आमंत्रित क्यों नहीं किया गया? क्या वजह है कि अलग-अलग राजनैतिक दलों के नेताओं के मध्य कड़वाहट अब इस निचले स्तर पर जा पहुंची है कि मेज़बानी करने वाला अपने आलोचकों को अथवा अपने विपक्षी को किसी कार्यक्रम में आमंत्रित नहीं करना चाहता तो दूसरी ओर नेताओं की बेहयाई व बेशर्मीे का पैमाना।

भी इतना ऊंचा हो गया है कि ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ की कहावत को चरितार्थ करते हुए वे स्वयं ही कार्यक्रम में पहुंच जाते हैं। चाहे इसके बदले में उन्हें धक्कामुक्की,गाली-गलौच,अपमान अथवा पुलिस थाने तक का सामना क्यों न करना पड़े? वैसे भी विशेष तौर पर मनोज तिवारी के साथ दिल्ली व दिल्ली के बाहर भी कई बार इस प्रकार की घटनाएं हो चुकी हैं कि उन्हें लोगों के हाथों से अपमानित होना पड़ा है। संभव है कहीं जनता ने उनके साथ ज़्यादती भी की हो परंतु हर जगह मनोज तिवारी सही हों और जनता की ग़लती हो ऐसा भी संभव नहीं है। ख़ासतौर पर सिग्नेचर ब्रिज के उद्घाटन के समय मनोज तिवारी की उद्घाटन समारेाह में उनके साथियों के साथ उपस्थिति तथा वहां पैदा किए गए हंगामे की सूरत तो इसी बात का सुबूत देती है।

अब आईए मनोज तिवारी को आमंत्रित न किए जाने की पृष्ठभूमि पर भी नज़र डाल लें। याद कीजिए 25 दिसंबर 2017 को जिस समय दिल्ली मैट्रो मजेंटा लाईन का उद्घाटन प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था उस समय विशिष्ट अतिथियों की सूची में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक तथा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का नाम तो था,वे लोग उद्घाटन के समय मंच पर भी आसीन थे परंतु दिल्ली सरकार की मैट्रो परियोजना में बराबर की साझेदारी होने के बावजूद राज्य के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को उस उद्घाटन समारोह में आमंत्रित किया जाना उचित नहीं समझा गया?आख़िर क्यों।
अब आईए ज़रा इसके पहले अर्थात् 2009 में भी झांककर देखें जबकि पहली मैट्रो ट्रेन ने नोएडा क्षेत्र में प्रवेश करते हुए उत्तर प्रदेश में अपनी प्रविष्टि दर्ज की थी। उस समय दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित तथा उत्तर प्रदेश की उस समय की मुख्यमंत्री रही मायावती दोनों ही उद्घाटन समारोह में एक साथ नज़र आए थे। ऐसे में 25 दिसंबर 2017 में दिल्ली मैट्रो मजेंटा लाईन के उद्घाटन अवसर पर योगी आदित्यनाथ व राज्यपाल नाईक को आमंत्रित करना तथा अरविंद केजरीवाल को आमंत्रित न करना राजनीति में गिरावट तथा संकीर्णता का सुबूत पेश करता है।
निश्चित रूप से मनोज तिवारी को भी ऐसे ही फ़ैसलों का परिणाम भुगतना पड़ा है। वैसे भी मनोज तिवारी, अरविंद केजरीवाल व उनकी सरकार द्वारा किए जा रहे किसी भी विकास कार्य की सदैव आलोचना करने में काफ़ी मुखर रहा करते हैं। बिना विरोध की बात के भी विरोध करते रहना मनोज तिवारी के कर्तव्यों में शामिल है। आप नेताओं के अनुसार वे कई बार अपने चंद साथियों के साथ दिल्ली की सांप्रदायिक सद्भाव की फ़िज़ा को भी ख़राब करने की कोशिश कर चुके हैं।

इसलिए ऐसी स्थिति भी नहीं बन सकी कि अरविंद केजरीवाल एक होनहार नेता या अपना मित्र होने के नाते ही उन्हें आमंत्रित कर सकते? पंरतु इससे भी बड़ा प्रश्र यह है कि जब तिवारी को आमंत्रित ही नहीं किया गया, उन्हें इस योग्य नहीं समझा गया या दिल्ली सरकार ने उन्हें आमंत्रित करना आवश्यक नहीं समझा फिर आख़िर ‘मान न मान मैं तेरा मेहमान’ बनने का कारण क्या था? अरविंद केजरीवाल भी यदि चाहते तो मुख्यमंत्री होने के नाते 25 दिसंबर 2017 के कार्यक्रम में अपने लाखों समर्थकों के साथ उद्घाटन स्थल पर पहुंच सकते थे।

और उद्घाटन समारोह का मज़ा ठीक उसी तरह किरकिरा करने की कोशिश कर सकते थे जैसा कि मनेाज तिवारी ने गत् चार नवंबर को सिग्रेचर ब्रिज के उद्घाटन के समय किया। परंतु न तो अरविंद केजरीवाल की ओर से ऐसा निचले स्तर का काम किया गया न ही उन्होंने अपने समर्थकों को उकसा कर उद्घाटन स्थल पर भेजने की कोशिश की। हां उनकी व उनके नेताओं की तरफ़ से प्रधानमंत्री,केंद्र सरकार व मैट्रो प्रबंधन से यह सवाल ज़रूर पूछा गया कि मुख्यमंत्री केजरीवाल को आमंत्रित क्यों नहीं किया गया।

भारतीय राजनीति का वह स्वर्णिम दौर जाने कहां विलुप्त हो गया जबकि पंडित जवाहरलाल नेहरू अपने मुख्य विपक्षी नेता डाक्टर राम मनोहर लोहिया से एकांत में बुलाकर सलाह-मशविरा किया करते थे,उनकी राय लेते थे यहां तक कि उनके चुनाव में हार जाने पर चिंतित भी होते थे और सदन में उनकी कमी महसूस करते थे। अटल बिहारी वाजपेयी स्वयं बातचीत के दौरान यह बता चुके हैं कि किस प्रकार राजीव गांधी ने प्रधानमंत्री रहते हुए उन्हें भारतीय प्रतिनिधि मंडल का नेता बनाकरअमेरिका केवल इसलिए भेजा ताकि वे अमेरिका में अपना इलाज करा सकें।
भारतीय संसद पर हुए हमले के दौरान किस प्रकार सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को फ़ोन कर उनकी सुरक्षा के प्रति अपनी चिंता ज़ाहिर की थी। देश की राजनीति का वर्तमान काल निश्चित रूप से राजनीति में मर्यादा तथा गरिमा की उन बुलंदियों से कहीं दूर चला गया है और अपने विरोधी या विपक्षी को अपना व देश का दुश्मन तथा राष्ट्रद्रोही समझने लगा है। इस प्रकार की घटनाएं ऐसे ही प्रदूषित व घिनौने राजनैतिक वातावरण का परिणाम हैं।

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