भेदभाव मुल्क को खोखला कर देता है : फ्रेंक एफ इस्लाम

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नई दिल्ली, 10 फरवरी (सईद अहमद/वेबवार्ता)। आपस के जोड़ में शक्ति है और बिखराव सबसे बड़ी कमजोरी। कुछ लोग भेदभाव का माहौल बनाकर देश को खोखला करने की कोशिश में लगे है। तरक्की की पहली और आखिरी सीढी तालीम है। बिना तालीम न तो हम कुछ कर सकते है और न ही किसी को कुछ दे सकते है।

उक्त वक्तव्य अमेरिकी उद्यमी और अमेरिकी पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के करीबी फ्रेंक एफ इस्लाम ने इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर में व्यक्त किए। इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर में आयोजित उनके सम्मान समारोह में अपना उदाहरण देते हुए कहा वे बहुत ही कम उम्र और बहुत ही कम पूंजी लेकर अमेरिका गए थे। अमेरिका जाकर उनका मकसद दौलत कमाना नहीं था बल्कि एक अच्छा इंसान बनना था। अच्छे इंसान बनने की कोशिश ने ही उन्हें आज इस मुकाम पर पहुंचा दिया। आप दुनिया के किसी भी कोने में रहे, किसी जगह जाकर तालीम ले और कहीं पर भी कारोबार करे लेकिन इंसान बनने की कोशिश हमेशा जारी रहनी चाहिए। तभी बिन मांगे आपकी मदद सारी कायनात करती है।

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उन्होंने अपने जीवन के बहुत से पहलुओं को उपस्थित जनसमूह के सामने रखा। इस अवसर पर इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के अध्यक्ष सिराजुद्दीन कुरैशी ने उन्हें इस्लामिक कल्चर सेंटर की सदस्यता देकर सम्मानित किया। इस अवसर पर अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के उपकुलपति जनरल ज़मीरुद्दीन शाह ने अल्पसंख्यकों खासकर मुस्लिम समुदाय को शिक्षा और प्रतियोगी शिक्षाओं में हिस्सा लेने की सलाह दी। उन्होंने सिख समुदाय की तरक्की की तारीफ़ करते हुए मुस्लिम समुदाय को सबक लेने को कहा। उन्होंने कहा कि वे दो प्रतिशत होते हुए 30 प्रतिशत आर्म फ़ोर्स में है और मुस्लिम 30 प्रतिशत होकर सिर्फ दो प्रतिशत फ़ोर्स में है। इस अवसर पर जामिया हमदर्द के उपकुलपति डाक्टर सैय्यद एहतशाम हसनैन और इंडिया इस्लामिक कल्चर सेंटर के उपाध्यक्ष एस.एम खान ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

गौरतलब है कि फ्रेंक एफ इस्लाम उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ में जन्मे। उनका असली नाम फ़खरे इस्लाम है लेकिन अमेरिका में सम्मान के तौर पर उनके नाम में फ्रेंक जोड़ दिया गया। उत्तरप्रदेश के आजमगढ़ में एक किसान परिवार में जन्मे फ्रैंक इस्लाम को मार्टिन लूथर किंग जूनियर पुरस्कार से भी नवाजा जा चुका है। उन्हें यह पुरस्कार फ्रैंक को उनकी मुहिम ‘सपनों को जिंदा रखने’ के लिए दिया गया था।

इस्लाम मात्र 15 साल की उम्र में अमेरिका चले गए थे। उस समय पांच सौ डॉलर (करीब 31 हजार रुपए) से भी कम अपने साथ ले जाने वाले इस्लाम बाद में एक सफल बिजनेस मैन बने। उन्होंने अपना घर गिरवी पर रखकर 1993 में मेरीलैंड की एक घाटे में चल रही आईटी कंपनी को 50 हजार डॉलर (करीब 31 लाख रुपए) खरीदा था। उन्होंने 2007 में अपनी आईटी कंपनी बेच दी और अपना जीवन परोपकार के कामों में लगा दिया। इस्लाम ने किंग और गांधी को अपना मार्गदर्शक मानते हैं।

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